Wednesday, August 30, 2017

गुण

#शब्द_मीमांसा #14

शब्द- गुण

शब्द प्रेरणा - चरक संहिता

दिनाँक - 24/08/2017

वैशेषिक दर्शन के अनुसार पदार्थ छः हैं - द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समन्वय । इसके अतिरिक्त कुछ स्थानों पर "अभाव" को भी पदार्थ माना गया है इसप्रकार कुल मिलाकर सात पदार्थ होते हैं और उनमें से "गुण" भी एक पदार्थ है ।

गुण शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के "गु" शब्द से हुई है जिसका अर्थ होता है बुराइयों का त्याग करना अर्थात जिसमें बुराइयां न हो वही गुण है । इसके अतिरिक्त गुण का अन्य अर्थ हैं धनुष की प्रत्यंचा, तंतु, दोहराना, दुर्बा घास आदि । किन्तु हम विवेचना करेंगे सात पदार्थों में से एक पदार्थ गुण की ।

भाषापरिच्छेद के अनुसार "द्रव्यश्रयी अर्थात द्रव्य में रहने वाला, कर्म से भिन्न और सत्तावन पदार्थ ही गुण है ।" इसके चौबीस प्रकार बताये गए हैं जो कि क्रमशः है - रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिणाम, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, यत्न, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, संस्कार, धर्म,  अधर्म तथा शब्द ।

शाक्त मतानुसार प्राथमिक सृष्टि की प्रथम अवस्था में शक्ति का जागरण दो रूपों क्रिया तथा भूति में होता है तथा इसके छः आश्रित गुणों का प्रकटीकरण होता है जो कि क्रमशः ज्ञान , शक्ति, प्रतिभा, बल, पौरुष एवं तेज हैं । वैष्णव सम्प्रदाय के अनुसार इन्हीं छः आश्रित गुणों द्वारा वासुदेव के पंचरात्रो में प्रथम और उनकी शक्ति लक्ष्मी का प्रादुर्भाव होता है । इसके अतिरिक्त अन्य छः गुणों के पृथक पृथक युग्म द्वारा अन्य पंचरात्रो संकर्षण, प्रद्युम्न और अनुरुद्ध तथा उनकी शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है ।

संख्या दर्शन के अनुसार गुण प्रकृति के घटक हैं तथा इनकी संख्या 3 है सत, रज तथा तम । श्रीमद्भागवत गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने इन्हीं तीन गुणों का व्याख्यान दिया है ।

चरक संहिता के शरीरस्थानम नामक अध्याय में भी इन्हीं तीन प्रकार के गुणों का वर्णन है जिसे वहां पर सत्व अर्थात मन कहा गया है तथा प्रत्येक को कई उपविभागों में वर्णित किया गया है -

सर्वप्रथम सत गुण के सात भेद बताये गए हैं जो कि क्रमशः है - ब्रह्म, आर्ष, ऐन्द्र, याम्य, वारुण, कौवेर तथा गन्धर्व ।

द्वितीय रजस गुणों को छः भेदों में बांटा गया है जिसके नाम क्रमशः आसुर, राक्षस, पैशाच, सार्प, प्रैत तथा शाकुन हैं ।

तृतीय तामस गुण के तीन भेद बताये गए हैं जोकि क्रमशः हैं - पाशव, मात्स्य तथा वानस्पत्य ।

संख्या दर्शन के अनुसार सत्व का अर्थ है प्रकाश अथवा ज्ञान, रज का अर्थ है क्रिया या गति एवं तम का अर्थ है अंधकार अथवा जड़ता । आगे कहा गया है कि जिस प्रकार तीन धागों से रस्सी बंटी जाती है उसी प्रकार सारी सृष्टि तीन गुणों से घटित है ।

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