Thursday, August 31, 2017

गुण (रजस)

#शब्द_मीमांसा #14B

शब्द - गुण (रजस)

शब्द संप्रेषक - अभिजीत दत्त जी ।

दिनाँक - 31/08/2017

तीन गुणों में से द्वितीय गुण है रजस गुण या रजो गुण जिसकी व्याख्या करते हुए गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहते हैं -

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोSशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ।।  (अध्याय 18 श्लोक 26)

अर्थात जो कर्ता आसक्ति से युक्त कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है - वह राजस कहा गया है

किन्तु उससे पूर्व ही श्लोक 23 में श्रीभगवान कहते हैं कि जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त होता है तथा भोगों को चाहने वाले पुरुष द्वारा या अहंकार युक्त पुरुष द्वारा किया जाता है वह कार्य राजस कहलाता है ।

श्लोक 31 में रजस बुद्धि के बारे में गोविंद व्याख्यायित करते हुए कहते हैं ; हे अर्जुन! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता वह बुद्धि राजस होती है ।

किन्तु है धनन्जय फल की इच्छा रखने वाला व्यक्ति जिस प्रकार धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्ति से धर्म, अर्थ तथा कामों को धारण करता है वह धारण शक्ति राजसी है । - ऐसा उदबोधन  श्रीभगवान द्वारा 34वें श्लोक में किया गया है अध्याय 18 के ।

राजस सुख के बारे में भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी श्लोक 38 में विवेचना करते हुए कहते हैं " जो सुख, विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है, वह भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विषतुल्य अर्थात बल, वीर्य, बुद्धि, धन, उत्साह तथा परलोक का नाश करने वाला होता है ।

रजस गुण जिन्हें चरक संहिता में रजस सत्व कहा गया है वहां पर इसके छः भेद बताये गए है जो कि क्रमशः हैं -

प्रथम भेद रजस गुण का है आसुर अर्थात जो शूरवीर, प्रचण्ड, दूसरों की निंदा करने वाला, ऐश्वर्यशाली, छल कपट करने वाला, रुद्र के तुल्य कोप से शत्रुओं को रुलाने वाला, भयंकर, दूसरों पर दया न करने वाला, अपनी ही बड़ाई चाहने वाला, आत्माभिमानी हो उसको आसुर जानें ।

द्वितीय भेद को राक्षस कहा गया है जो असहनशील, कारण से कुपित होने वाला, छिद्र अर्थात शत्रु के कमजोर स्थान पर वार करने वाला, क्रूर, भोजन में अधिक रुचि रखने वाला, मांस का बहुत प्यारा, खूब सोने और खूब परिश्रम करने वाला, ईर्ष्याशील हो उसे "राक्षस" चित्त वाला जानें ।

तृतीय भेद को पैशाच कहा गया है । जो बहुत खाने वाला, स्त्री के समान स्वभाव वाला, स्त्रियों के साथ एकांत में रहने की इच्छा रखने वाला, अपवित्र, शुद्धता व स्वच्छता से द्वेष रखने वाला, भीरू, दूसरों को डराने वाला, विकृत आहार और विकृत विहार वाला हो उसको पैशाच स्वभाव वाला जानें ।

रजस गुणों का चौथा भेद "सार्प" नाम से जाना जाता है अर्थात जो क्रोधित होने पर शूर और अक्रोध की स्थिति में भीरू, तीखे स्वभाव वाला, परिश्रम करने वाला, भययुक्त स्थानों में भी दिखने वाला और आहार विहार करने वाला हो उस व्यक्ति को सार्प जानें ।

पंचम भेद रजस गुणों का प्रैत नाम से अभिप्रेत है अर्थात जो सदा भोजन की इच्छा रखने वाला ,बहुत दुःखशील और आचार तथा उपचार से युक्त, निंदा करने वाला, दूसरों को अपने धन में भाग न देने वाला, बहुत लोभी, कर्म न करने वाला पुरूष हो उसको "प्रैत" या प्रेत स्वभाव वाला जाने ।

छठा और अंतिम भेद रजस गुणों का है "शाकुन" अर्थात जो कामों में निरंतर फंसा हुआ , निरन्तर आहार-विहार में लिप्त, चंचल, असहनशील, संचय न करने वाला पुरुष हो उसको शाकुन जानें ।

Wednesday, August 30, 2017

गुण (सात्विक)

#शब्द_मीमांसा #14A

शब्द - गुण (सात्विक)

शब्द संप्रेषक - अभिजीत दत्त जी ।

दिनाँक - 26/08/2017

तीनो गुणों में प्रथम और सर्वोच्च गुण है सत अथवा सात्विकता । श्रीमद्भागवतगीता में भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी कहते हैं -

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतं ।
अफल प्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्चते ।। (गीता 18/23)

 जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न  चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग द्वेष के किया गया हो - वह सात्विक कहा जाता है ।

आगे श्लोक 26 में श्रीभगवान कहते हैं जो कर्ता संगरहित , अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष शोकादि विकारों से रहित है - वह सात्विक कहा जाता है ।

 श्लोक 29 में अभिवर्णित किया गया है कि जो बुद्धि प्रवृत्ति मार्ग अर्थात गृहस्थ में रहते हुए फल और आसक्ति का त्यागकर भगवदर्पण बुद्धि से केवल लोकशिक्षा के लिए है तथा निवृत्ति मार्ग अर्थात देह का अभिमान त्यागने वाला, कर्तव्य और अकर्तव्य, भय तथा अभय को एवं बन्धन और मोक्ष को यथार्थ जानती है वह बुद्धि सात्विकी है ।

चरक संहिता के द्वितीयखण्ड के पंचम अध्याय जिसे शारीरस्थानम् नाम से शीर्षित किया गया है में इस सात्विक चित्त के सात भेद बताये गए हैं जो कि क्रमशः -

सात्विक चित्त का प्रथम भेद है ब्राह्म । इसके गुणों के वर्णन इस प्रकार है - जो पवित्र, सत्यप्रतिज्ञ, जितात्मा, सम्पत्ति और सत्फ़ल को अन्यों के साथ बांटकर भोगने वाला, ज्ञान-विज्ञान, वचन-प्रतिवचन की शक्ति से युक्त, स्मृतिमान काम, क्रोध, लोभ, अभिमान, मोह, ईर्ष्या, हर्ष और क्रोध से रहित, सब प्राणियों में समबुद्धि रखने वाला हो उसे ब्राह्म प्रकृति का जानें ।

द्वितीय सात्विक चित्त है आर्ष । जिसका वर्णन है - जो यज्ञ करने वाला, अध्ययनशील, व्रत का पालक, होमशील, ब्रह्मचर्य का पालक, अतिथिपूजक, मद, मान, राग, द्वेष, मोह, लोभ और रोष से रहित, प्रतिभा से युक्त वचन, विज्ञान, उपधारणा इन शक्तियों से सम्पन्न पुरुष हो उसको आर्षचित्त वाला जानें ।

तृतीय सात्विक चित्त का प्रकार है ऐन्द्र । जो ऐश्वर्यवान, ग्रहण करने योग्य वाक्य वाला, यज्ञ करने वाला, शूर, ओजस्वी, तेज़ से युक्त, साहसिक, क्रूर कर्मों को न करने वाला, दूरदर्शी, धर्म, अर्थ और काल दत्तचित्त पुरुष को "ऐन्द्र" समझें ।

चतुर्थ सात्विक चित्त का भेद है याम्य । जो कर्तव्य और अकर्तव्य की मर्यादा में रहने वाला, प्राप्तकारी अर्थात अवसर के अनुसार कार्य करने वाला, असंप्रहार्य अर्थात जिसपर कोई प्रहार न कर सके और न ही जिसकी मार रोकी जा सके, उन्नतिशील, स्मृतिवान, ऐश्वर्यशील, राग, द्वेष, मोह से रहित पुरुष हो उसको याम्य जाने ।

पंचम भेद वारुण का वर्णन है - जो शूरवीर, धीर, पवित्र और मैलेपन से द्वेष करने वाला, यज्ञ करने वाला, जलक्रीड़ा में रत, क्लिष्ट कर्मों से भिन्न सुख से होने वाले कर्मों को करने वाला, उचित स्थान पर कोप तथा कृपा करने वाला पुरुष हो उसको वारुण जानें ।

षष्ठ भेद है सात्विक चित्त का "कौबेर" । जो स्थान, मान, उपभोग, सामग्री, परिवार से युक्त, नित्य शर्म, अर्थ और काम में तत्पर, पवित्र, सुखपूर्वक विहार विनोद करने वाला, उचित स्थान पर कोप व प्रसन्नता प्रकट करने वाला पुरुष हो उसको कौबेर प्रकृति का जानें ।

सप्तम तथा अंतिम भेद है सात्विक चित्त का जिसे गांधर्व से संज्ञापित करते हैं । जो नृत्य, गीत, बाजे, स्त्रोत, श्लोक, आख्यायिका, इतिहास, पुराणों को पसन्द करने वाला, इनमें कुशल, सुगन्ध, माला,  अनुलोम, वस्त्र, स्त्रियों के साथ विहार करने वाला, अनिंद्य पुरुष हो उसको "गांधर्व" जाने ।

गुण

#शब्द_मीमांसा #14

शब्द- गुण

शब्द प्रेरणा - चरक संहिता

दिनाँक - 24/08/2017

वैशेषिक दर्शन के अनुसार पदार्थ छः हैं - द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समन्वय । इसके अतिरिक्त कुछ स्थानों पर "अभाव" को भी पदार्थ माना गया है इसप्रकार कुल मिलाकर सात पदार्थ होते हैं और उनमें से "गुण" भी एक पदार्थ है ।

गुण शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के "गु" शब्द से हुई है जिसका अर्थ होता है बुराइयों का त्याग करना अर्थात जिसमें बुराइयां न हो वही गुण है । इसके अतिरिक्त गुण का अन्य अर्थ हैं धनुष की प्रत्यंचा, तंतु, दोहराना, दुर्बा घास आदि । किन्तु हम विवेचना करेंगे सात पदार्थों में से एक पदार्थ गुण की ।

भाषापरिच्छेद के अनुसार "द्रव्यश्रयी अर्थात द्रव्य में रहने वाला, कर्म से भिन्न और सत्तावन पदार्थ ही गुण है ।" इसके चौबीस प्रकार बताये गए हैं जो कि क्रमशः है - रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिणाम, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, यत्न, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, संस्कार, धर्म,  अधर्म तथा शब्द ।

शाक्त मतानुसार प्राथमिक सृष्टि की प्रथम अवस्था में शक्ति का जागरण दो रूपों क्रिया तथा भूति में होता है तथा इसके छः आश्रित गुणों का प्रकटीकरण होता है जो कि क्रमशः ज्ञान , शक्ति, प्रतिभा, बल, पौरुष एवं तेज हैं । वैष्णव सम्प्रदाय के अनुसार इन्हीं छः आश्रित गुणों द्वारा वासुदेव के पंचरात्रो में प्रथम और उनकी शक्ति लक्ष्मी का प्रादुर्भाव होता है । इसके अतिरिक्त अन्य छः गुणों के पृथक पृथक युग्म द्वारा अन्य पंचरात्रो संकर्षण, प्रद्युम्न और अनुरुद्ध तथा उनकी शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है ।

संख्या दर्शन के अनुसार गुण प्रकृति के घटक हैं तथा इनकी संख्या 3 है सत, रज तथा तम । श्रीमद्भागवत गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने इन्हीं तीन गुणों का व्याख्यान दिया है ।

चरक संहिता के शरीरस्थानम नामक अध्याय में भी इन्हीं तीन प्रकार के गुणों का वर्णन है जिसे वहां पर सत्व अर्थात मन कहा गया है तथा प्रत्येक को कई उपविभागों में वर्णित किया गया है -

सर्वप्रथम सत गुण के सात भेद बताये गए हैं जो कि क्रमशः है - ब्रह्म, आर्ष, ऐन्द्र, याम्य, वारुण, कौवेर तथा गन्धर्व ।

द्वितीय रजस गुणों को छः भेदों में बांटा गया है जिसके नाम क्रमशः आसुर, राक्षस, पैशाच, सार्प, प्रैत तथा शाकुन हैं ।

तृतीय तामस गुण के तीन भेद बताये गए हैं जोकि क्रमशः हैं - पाशव, मात्स्य तथा वानस्पत्य ।

संख्या दर्शन के अनुसार सत्व का अर्थ है प्रकाश अथवा ज्ञान, रज का अर्थ है क्रिया या गति एवं तम का अर्थ है अंधकार अथवा जड़ता । आगे कहा गया है कि जिस प्रकार तीन धागों से रस्सी बंटी जाती है उसी प्रकार सारी सृष्टि तीन गुणों से घटित है ।

मीमांसा

#शब्द_मीमांसा #13

शब्द - मीमांसा

शब्द संप्रेषक - नितिन गुप्ता जी

दिनाँक - 23/08/2017

प्राचीन भारतीय वैदिक दर्शन को छः भागों में बांटा गया है जिसे षड्दर्शन कहा जाता है जो कि हैं क्रमशः - संख्या दर्शन, योग दर्शन,  न्याय दर्शन, वैशेषिक दर्शन, वेदांत दर्शन तथा मीमांसा ।

मीमांसा शब्द का पाणिनि के अनुसार शाब्दिक अर्थ है "जानने की इच्छा या लालसा ।"
चतुर्वेद कोष के अनुसार मीमांसा का अर्थ है गूढ़ विचार या अनुसंधान अथवा खोज है । मीमांसा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के "मीम्" शब्द से हुई है जिसका अर्थ होता है "शब्द की विवेचना करना" ।

मीमांसा का तात्विक दर्शन विपक्षण है । इसकी गणना अनीश्वरवादी दर्शनों में की जाती है । आत्मा, ब्रह्म, जगत आदि की विवेचना इसमें ही आती यह केवल वेद तथा उसके शब्दों की नित्यता का ही प्रतिपादन करता है ।

मीमांसा दर्शन को दो भागों में बांटा गया है प्रथम है पूर्वमीमांसा इसके लेखक जैमिनी है । पूर्वमीमांसा में कुल 907 अधिकरण तथा 2645 सूत्र हैं । प्रत्येक अधिरण पांच भागों में बंटा हुआ है जो है क्रमशः - विषय, संशय, पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष तथा सिद्धांत । मीमांसा का द्वितीय भाग है उत्तरमीमांसा इसके ग्रन्थ ब्रह्मसूत्र के रचयिता हैं वादरायण ।

किसी शब्द अथवा पद की मीमांसा किये जाने के लिए कुछ सिद्धांतो का पालन किया जाना आवश्यक होता है -

प्रथम सिद्धांत है शाब्दिक मीमांसा का सिद्धांत अर्थात किसी भी वाक्य या शब्द के व्याकरणीय शाब्दिक अर्थ पर सर्वप्रथम  ध्यान दिया जाना चाहिए ।

द्वितीय सिद्धांत हैं शब्द के विषय तथा आशय को देखा जाना अर्थात शब्द जहाँ प्रयोग किया जा रहा है उसका विषय तथा आशय क्या है उसी अनुसार शब्द का अर्थ लगाया जाना चाहिए ।

तृतीय सिद्धांत है रिष्टि परिहार का सिद्धांत अर्थात यदि प्रारम्भ के दोनों सिद्धांतो से सही अर्थ नहीं निकल रहे हो तो उक्त शब्द का वही अर्थ निर्दिष्ट किया जाना चाहिए जो कि लोकहित में हो ।

चतुर्थ सिद्धांत है सहचर्येण ज्ञायते का अर्थात विशेष शब्दों के साथ आने वाले सामने शब्दों का भी उसी क्रम में अर्थ होता है जो कि विशेष शब्दों से आशय निकलता हो ।

पूर्वमीमांसा में तात्पर्य निर्णय के लिए सात बातों को आवश्यक बताया गया है जो कि क्रमशः है -

उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास अपूर्वता अर्थात नवीनता, फल यानी उद्देश्य, अर्थवाद अर्थात महात्म्य और अंतिम है  उपपत्ति जिसका अर्थ होता है प्रमाणों द्वारा सिद्धी ।

अर्तिका

#शब्द_मीमांसा #12

शब्द - अर्तिका

शब्द संप्रेषक - सारिका सौरभ

 शब्द अर्तिका वास्तव में संस्कृत भाषा का शब्द है इसका अर्थ होता है "बड़ी बहन" ।  इसे इसी तरह से हूबहू हिंदी भाषा ने अपना लिया बिना किसी अपभ्रंश के ।

 स्त्री को प्रत्येक रूप में पूजनीय माना गया है चाहे वो माता हो, बहन हो, पुत्री या पत्नी हो । मनु ने कहा है "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" अर्थात जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवता रमण करते हैं ।

बात करते हैं बहनों की जैसा कि परम्परा रही है साल में दो बार हम बहनों से आशीर्वाद लेते हैं एक बार तो दीपावली के बाद भैया दूज में और दूसरी बार रक्षाबंधन पर । हमारे बीच एक गलत धारणा प्रचलित है कि रक्षा बंधन पर बहन भाई की कलाई पर राखी इसलिए बंधती है कि वो उसकी रक्षा करे । जी नहीं ये सत्य नहीं है वो इसलिए बांधती है ताकि उसका भाई पूरे वर्ष रोगों तथा व्याधियों से मुक्त रहे और उसे हमेशा सद्बुद्धि और सद्विचार प्राप्त हों ।

यजुर्वेद में कहा गया है "जिसे रक्षा बंधन बांधा जाता है वह पूरे वर्ष निरोग, संकटो को जीतने वाला और उत्तम विचारों वाला बना रहता है ।"  अर्थात वो बन्धन अपनी स्वयं की रक्षा के हेतु न होकर जिसे बांधते है उसकी रक्षा के लिए होता है । ताकि वह व्यक्ति अपने कर्तव्यों को पूरा कर सके जो कि उसके परिवार, समाज तथा राष्ट्र के प्रति होते है ।

अन्याय

#शब्द_मीमांसा #12

शब्द - अन्याय

शब्द संप्रेषक - आशीष अग्रवाल जी ।

दिनाँक - 22/08/2017

हमारे शास्त्रों में वर्णित है कि "अन्याय पूर्वक अर्जित किया हुआ धन केवल दस वर्षों तक  जीवित रहता है ग्यारहवें वर्ष उसका अवश्य ही नाश हो जाता है । वास्तव में अन्याय एक नकारात्मक अवधारणा है  । अन्याय से आशय होता है जहाँ न्याय नहीं होता है । अर्थात जहां न्याय की आशा अथवा इच्छा की जाती है किंतु न्याय प्राप्त नहीं होता । परन्तु न्याय की मांग या आशा न किये जाने पर अथवा न्याय प्राप्त करने हेतु स्वयं क्रियाशील न होने पर अधिकारों का लोप अन्याय नहीं है ।

यदि हम अन्याय शब्द को परिभाषित करने का प्रयत्न करें तो पाते हैं कि "अन्याय किसी व्यक्ति के प्राप्त होने वाले अधिकारों का लोप किया जाना है।"

अन्याय की तीन श्रेणियां होती हैं -

अन्याय की प्रथम श्रेणी है न्याय ही नहीं दिया जाना । इसके अंतर्गत किसी व्यक्ति को प्राप्त होने वाले अधिकारों का आहरण बिना किसी कारण के कर लिया जाता है तथा उसके प्रयासों के उपरांत  भी उसे युक्तियुक्त तौर पर अपने अधिकार नहीं प्राप्त होते हैं ।

अन्याय का दूसरा स्तर है न्याय प्रदान करने में देर किया जाना । जब न्याय प्रदान करने में इतना देर हो जाये जब विक्षुब्ध व्यक्ति के लिए उक्त न्याय अथवा अधिकार का औचित्य एवं अर्थ खत्म हो जाता है वह भी अन्याय की श्रेणी में आता है ।

तृतीय है न्याय के सिद्धांतों का पालन न किया जाना, किसी भी न्याय निर्णयन में । नैसर्गिक न्याय अथवा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतो का पालन किया जाना आवश्यक है न्याय निर्णयन में इसके कुछ सिद्धांत इस प्रकार है -

  1- कोई भी व्यक्ति स्वयं के मामले में न्यायधीश नहीं हो सकता है । अर्थात न्याय निर्णयन में किसी भी पक्षकार को न्यायाधीश बनने की इजाजत नहीं दी जा सकती है क्योंकि ऐसे मामलात में व्यक्ति न चाहते हुए भी पक्षपात कर लेता है, जिससे कि न्याय की अवधारणा को चोट पंहुचती है ।

2- द्वितीय है निर्णय को कारण सहित दिया जाना चाहिए । यदि न्याय देना है तो आवश्यक है कि अधिकारों को दिए जाने अथवा उसका लोप किये जाने का कारण बताया जाना चाहिए ताकि पक्षकार संतुष्ट हो सके कि ऐसा क्यों किया गया यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो वह न्याय की श्रेणी में नहीं आता है ।

3- तृतीय है पक्षकारों को सुना जाना चाहिए तथा उन्हें इसका पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए कि वे अपना पक्ष रख सकें । इस सिद्धांत के दो हिस्से होते हैं प्रथम सूचना दिया जाना तथा दूसरा सुनवाई का पर्याप्त अवसर दिया जाना क्योंकि हम बिना किसी को अवसर दिए यदि एक पक्ष को सुनकर निर्णय देते हैं तो वह अन्याय कहलायेगा ।

किन्तु कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं जहां इन नियमों का पालन किया जाना आवश्यक नहीं होता है और उन्हें अन्याय की श्रेणी में भी नहीं रखा जाता है -

प्रथम आपातकाल में अपवर्जन , क्योंकि धर्मों में आपद्धर्म को उच्चतम माना गया है जहां पर अन्याय से विक्षुब्ध होने वाले कि अपेक्षा उससे लाभान्वित होने वाले लोगों की संख्या अधिक है ।

जहां लोकहित जुड़ा हुआ है वहां ओर न्याय के सिद्धांतों का पालन किया जाना आवश्यक नहीं है ।क्योंकि लोकहित का पलड़ा हमेशा किसी भी न्याय या अन्याय से भारी होता है ।

जहां पर न्याय के इन नियमों को लागू किया जाना अव्यहारिक हो । वहां पर इनको न लागू किया जाना कोई अन्याय नहीं है ।

आश्रम

#शब्द_मीमांसा #11

शब्द- आश्रम

शब्द संप्रेषक - अंकुर पंड्या जी ।

दिनाँक - 20/08/2017

जैसा कि सर्वविदित है कि भारतीय संस्कृति में जीवन के अभी अंगों को व्यवस्थित करने का चलन रहा है । जीवन को व्यवस्थित करने हेतु आश्रम तथा पुरुषार्थ का प्रणयन किया गया है ।मनुष्य जन्मना अनगढ़ और असंस्कृत होता है वह संस्कारो द्वारा ही संस्कृत और प्रबुद्ध हो जाता है और यही संस्कार आश्रम व्यवस्था के आधार हैं ।

अमरकोश के टीकाकार भानुजी दीक्षित के अनुसार आश्रम शब्द की उत्पत्ति "श्रम"शब्द से हुई है जिसका अर्थ होता है मेहनत करना अथवा पुरुषार्थ करना । सामान्य तौर पर आश्रम शब्द के तीन अर्थ प्रचलित है -

1- वह स्थिति या स्थान जहां पर श्रम किया जाता है ।
2- स्वयं श्रम अथवा तपस्या करना । तथा
3- विश्रामावस्था ।

वास्तव में आश्रम जीवन की वे अवस्थाएं हैं जिनमें मनुष्य श्रम, साधना और तपस्या करता है और एक अवस्था की उपलब्धियों को प्राप्त करके तथा इनसे विश्राम लेकर जीवन के आगामी पड़ाव की तरफ प्रस्थान करता है ।

मनुष्य के अनुसार मनुष्य का जीवन सौ वर्षों का होना चाहिए (शतायुर्वे पुरुषः) एतएव चार आश्रमों में विभाजन 25-25 वर्ष का होना चाहिए प्रत्येक मनुष्य के जीवन की चार अवस्थाएं मोटे तौर पर मानी जाती है -

1-बाल्यकाल तथा किशोरावस्था;
2- यौवन;
3- प्रौढ़ावस्था;  तथा
4- वृद्धावस्था ।

इन्ही अवस्थाओं के आलोक में चार आश्रमों की व्यवस्था की गई है । आश्रमों के नाम तथा क्रम में कहीं कहीं अंतर पाया जाता है -

आपस्तम्ब गृहसूत्र के अनुसार गृहस्थ, आचार्यकुलम (ब्रह्मचर्य) , मौन तथा वानप्रस्थ हैं ।

गौतम धर्मसूत्र के अनुसार आश्रमों के नाम क्रमशः ब्रह्मचारी, गृहस्थ, भिक्षु तथा वैखानस हैं ।

वशिष्ठ धर्मसूत्र के अनुसार आश्रमों की व्यवस्था क्रमशः ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा परिव्राजक हैं ।

किन्तु मनु द्वारा बताए गए चार आश्रम और उनके क्रम ही सबसे ज्यादा प्रचलित हैं जो इस प्रकार हैं ।

प्रथम है ब्रह्मचर्य आश्रम । इस आश्रम में प्रवेश व्यक्ति उपनयन संस्कार के उपरांत करता है तथा चूड़ाकर्म के बाद निकल कर बाहर आता है । इस आश्रम में मात्र धर्म नामक पुरुषार्थ को स्थान दिया गया है । मनु के अनुसार ब्रह्मचर्य में गुरुकुल में निवास करते हुए विद्यार्जन और व्रत का पालन करना चाहिए ।

द्वितीय आश्रम को मनु ने गृहस्थ नाम दिया है । यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है । इस आश्रम में व्यक्ति का प्रवेश विवाह संस्कार के साथ करता है । इस आश्रम में चारो पुरुषार्थों का पालन करना पड़ता है अर्थात उसे धर्मपूर्वक अर्थ का अर्जन करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन अकर्ता की भांति अथवा फल की इच्छा से मुक्त होकर (जिसे मोक्ष कहा गया है) करना चाहिए । मनुस्मृति के अनुसार गृहस्थ आश्रम में विवाह करके घर बसाना चाहिए तथा सन्तानोतपत्ति द्वारा पितृ ऋण, यज्ञ द्वारा देवऋण तथा नित्य स्वाध्याय द्वारा ऋषि ऋण चुकाना चाहिए ।

तृतीय आश्रम को मनु ने वानप्रस्थ कहा है । वन का अर्थ मात्र जंगल ही नहीं होता अपितु उसके अन्य अर्थ जल तथा समाज भी होते हैं । यहां वन का अर्थ समाज है अर्थात समाज की तरफ प्रस्थान कर देना ही वानप्रस्थ है । इस आश्रम में पुरुषार्थ के रूप में मात्र धर्म, काम तथा मोक्ष होते हैं अर्थात अब व्यक्ति को अनासक्त भाव से समाज की तरफ प्रस्थान कर देना चाहिए । मनु के अनुसार इस आश्रम में व्यक्ति को सामरिक कार्यों से उदासीन होकर तप, स्वाध्याय, यज्ञ, दान आदि द्वारा वन में जीवन बिताना चाहिए ।

चतुर्थ आश्रम को सन्यास नाम से संज्ञापित किया गया है । सन्यास अर्थात आप अब परिवार के ही नहीं बल्कि समाज के भी हो जाते हैं आप स्वयं को एक न्यास के रूप में परिवर्तित कर देते हैं । मनु ने भी कहा है इस आश्रम में व्यक्ति सांसारिक सम्बन्धों को त्यागकर अनागरिक हो जाता है ।

सार रूप से हम देखते हैं कि हमारे जीवन को अवस्थाओं के अनुसार संस्कार और पुरुषार्थों को व्यवस्थित करने की एक प्रक्रिया बनाई गई है जिसे हम आश्रम नाम से उद्बोधित करते हैं ।

षड्यंत्र

#शब्द_मीमांसा #10

शब्द- षड्यंत्र

शब्द संप्रेषक - मोटाभाई कनाणी

दिनाँक - 19/08/2017

किसी भी अपराध के गठन हेतु तत्वों की आवश्यकता होती है प्रथम दुर्भावना और द्वितीय दुष्कृत्य । यह सामान्य सिद्धांत है कि साधारणतः सभी अपराधों में दोनों का होना आवश्यक माना जाता है किंतु कुछ अपराध ऐसे भी होते हैं जो केवल मानसिक होते हैं तथा उनमें दुर्भावना या दुराशय का तत्व ही गठित करने के लिए पर्याप्त होता है उसमें से षड्यंत्र भी एक इसी प्रकार का अपराध है ।

शब्द षड्यंत्र दो शब्दों के मेल से बना है । प्रथम शब्द है "षड़" जिसका अर्थ होता है छः अर्थात व्यक्ति की छः दुष्प्रवृत्तियाँ जिन्हें काम, क्रोध, लोभ,मोह, मद, मत्सर नाम से जाना जाता है । द्वितीय शब्द है "यंत्र" जिसका यहां पर आशय है "युक्ति अथवा जाल" । अर्थात व्यक्ति की छः दुष्प्रवृत्तियों से प्रेरित होकर बनाया गया गुप्त जाल अथवा युक्ति ही षड्यंत्र है ।

षड्यंत्र के अपराध के गठित होने के लिए कुछ चीजो क् होना आवश्यक है -

प्रथम है दुर्भावना पूर्ण आशय क्योंकि यदि आशय दुर्भाग्यपूर्ण न होकर सद्भावना पूर्ण होगा तो यह षड्यंत्र ने होकर योजना मात्र रह जायेगी ।

द्वितीय है कि षड्यंत्र में कम से कम दो अथवा दो से अधिक लोग होने आवश्यक है क्योंकि एक व्यक्ति अकेले कोई षड्यंत्र नहीं कर सकता क्योंकि अन्य दशाएं पूर्ण नहीं हो सकेंगी षड्यंत्र के लिए एक व्यक्ति द्वारा ।

तृतीय आवश्यकता है व्यक्तियों के बीच एक संविदा होनी चाहिए उस  कार्य को करने की उनके आशय सामान्य होने चाहिए अर्थात सभी व्यक्ति एक ही बिंदु पर एक ही तरह से सहमत होने चाहिए उनमें मत वैभिन्य नहीं होना चाहिए उक्त कार्य के प्रति ।

चौथी आवश्यकता है षड्यंत्र के अपराध के गठन हेतु कि सभी व्यक्तियों के जो उस दुष्कृत्य मे संलग्न हो सबके मस्तिष्क पहले से मिले होने चाहिए यदि कोई एक व्यक्ति किसी को मार रहा हो दूसरा भी आकर मारने लगे तो उसे षड्यंत्र नहीं कहेंगे ।

तथा पांचवी तथा अंतिम आवश्यकता है इस अपराध के लिए कि षड्यंत्र में शामिल सभी लोग अपने सामान्य आशय अथवा सामान्य उद्देश्य के अग्रसारण में कार्य करें ।

यदि हम षड्यंत्र के प्रकारों की बात करें तो पाते हैं कि प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री "माइकल बरकुन" ने षड्यंत्र के कार्यक्षेत्र के आधार पर इसे तीन प्रकार का बताया है -

प्रथम है घटनात्मक षड्यंत्र इसके अंतर्गत एक सीमित घटना हेतु षड्यंत्र किये जाते हैं तथा यह किसी घटना विशेष अथवा घटनाओं के समूह के लिए उत्तरदायी होता है ।

दूसरा है प्रणालीगत षड्यंत्र । इसके अंतर्गत षड्यंत्रों की एक पूरी प्रणाली कार्य करती है इसका उद्देश्य किसी जाति , धर्म या राष्ट्र आदि के विरुद्ध होता है ।

तीसरा और अंतिम है अतिषड्यंत्र । इसके अंतर्गत घटनात्मक तथा प्रणालीगत षड्यंत्रों की एक लंबी श्रृंखला शामिल होती है इन्हें परस्पर गूंथा जाता है आपस में ।

मोक्ष

#शब्द_मीमांसा #9

शब्द - मोक्ष

शब्द संप्रेषक - प्रीति सिंह

दिनाँक - 18/08/2017

सर्वधर्मान्परित्यज्य नामेकं शरणंब्रज: ।
अहम् त्वाम् सर्वपापेभ्यो मोक्षं स्याति मा शुचः ।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं हे पार्थ! अपने सभी धर्मो का त्याग करके मेरी शरण में आ जाओ मैं तुम्हे समस्त पापोंसे मोक्ष दे दूंगा ।

इसी प्रकार भारतीय संस्कृति में भी व्यक्ति के चार पुरुषार्थ बताये गए हैं जिसमें से चौथा पुरुषार्थ है है मोक्ष ।

मोक्ष शब्द का शाब्दिक अर्थ देखा जाय तो होता है "मा इच्छाम्" अर्थात जब व्यक्ति की कोई इच्छा शेष न रह जाये । दूसरे शब्दों में जब व्यक्ति की समस्त इच्छाओं का शमन हो जाये उसी स्थिति को मोक्ष कहा गया है ।

इसके अतिरिक्त कुछ अन्य अर्थ भी इस शब्द से सम्बद्ध है जैसे मुक्त करना, क्षमा करना, समाप्त कर देना आदि ।किन्तु विभिन्न दार्शनिक सिद्धांतो में इसके जो अर्थ प्रयुक्त किये जाते हैं वे कुछ इस प्रकार हैं ।

संख्या दर्शन जिसे गीता में संन्यास दर्शन भी कहा गया है के अनुसार मोक्ष का तात्पर्य है व्यक्ति के पुरुष तत्व को प्रकृति तत्व से अलग करके पुरुष तत्व को परमपुरुष तत्व में विलीन कर देना ही मोक्ष है ।

गीता के कर्मयोग के अनुसार व्यक्ति द्वारा अकर्ता बनकर कर्म करना अर्थात सात्विक कर्मों को करते हुए उनके फलों के प्रति अनासक्ति ही मोक्ष है ।

भक्तियोग के अनुसार जीव का ईश्वर के साथ एकाकार हो जाना ही मोक्ष है । अर्थात ईश्वर को जानना और उसकी दिव्यता मे समाहित हो जाना ।

बौद्ध दर्शन में मोक्ष की स्थिति को निर्वाण कहा गया है । भगवान बुद्ध के अनुसार यह संसार दुःखमय है तथा दुःखों का कारण तृष्णा अर्थात इच्छाएं हैं और इन्हीं इच्छाओं की समाप्ति ही मोक्ष अर्थात निर्वाण है ।

जैन दर्शन केअनुसार चरमस्थिति अर्थात मोक्ष को कैवल्य कहा गया है । कैवल्य को प्राप्त करने वाले मनीषी को अर्हत कहा जाता है । जैन धर्म के दर्शन स्यादवाद के अंतर्गत माना जाता है कि किसी भी पदार्थ की सात अवस्थाएं होती हैं और सातों को कोई भी सामान्य व्यक्ति एक साथ नहीं जान या समझ सकता है इसलिए उसमें इच्छाएं बनी रहती हैं तथा अर्हत ही पदार्थ की सभी सात अवस्थाओं को एक साथ देख व समझ सकता है अर्थात उसकी इच्छाओं की समाप्ति हो जाती है ।

पातंजल योग दर्शन के अनुसार मूलाधार से निकलने वाली ऊर्जा समस्त पांच ऊर्जा कोषों को बेधकर जब आज्ञा चक्र अर्थात ब्रह्म में समाहित हो जाये तो उस स्थिति को मोक्ष कहा गया है ।


न्याय एवं वैषेशिक दर्शन का मानना है कि यदि सुख है तो दुःख अवश्य होंगे यही शाश्वत सत्य है इसलिए मात्र सुख की इच्छा करना बेकार है । दुःख का नाश एक ही दशा में सम्भव है जबकि सुख प्राप्ति की इच्छा त्याग कर दिया जाए और जब हम सुख प्राप्ति की इच्छा का त्याग कर देते हैं उसी स्थिति को मोक्ष कहा गया है ।

द्वैतवाद और अद्वैतवाद दोनों अगर सतही रूप से देखा जाए तो एक दूसरे के विपरीत प्रतीत होते हैं किंतु सूक्ष्म रूप से उनका उद्देश्य जीव को जी को ईश्वर का अंश है उसमें विलीन करना है । इसी स्थिति को इन दोनों दर्शनों मे मोक्ष कहा गया है । ईश्वर का अर्थ होता है "इष्टम् सः वर:" अर्थात जो समस्त इच्छाओं में सर्वश्रेष्ठ इच्छा है । यदि आपको अपनी सर्वश्रेष्ठ इच्छा प्राप्त हो जाती है तो आपकी कोई अन्य इच्छा नहीं बचती है और यहां भी इच्छाओं कक समाप्ति ही मुक्ति है ।

अतैव साररूप में हम कह सकते हैं कि व्यक्ति की इच्छाओं को जो की असीमित कही जाती हैं उन्हीं का अंत अर्थात दुःखों का , कामना का और आसक्ति का अंत ही मोक्ष है ।

सन्यास

#शब्द_मीमांसा #8

शब्द- सन्यास

शब्द संप्रेषक - प्रीति सिंह

दिनाँक - 17/08/2017

भारतीय संस्कृति में जीवन, समाज तथा राष्ट्र को एक आदर्श रूप से व्यवस्थित किया गया है और प्रत्येक पड़ाव को जो जिस योग्य है वैसे नियम प्रदान किये गए हैं भारतीय संस्कृति जीवन को चार भागों में बांटती है जिसे आश्रम कहते हैं । वे आश्रम है ; ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा सन्यास ।

सन्यास की अवधारणा मात्र भारतीय संस्कृति में ही प्राप्त होती है अन्य किसी संस्कृति में यदि आप खोजेंगे तो इससे मिलती जुलती अवधारणा नहीं प्राप्त होगी ।

सन्यास शब्द के अर्थ की बात करें तो इसका शाब्दिक अर्थ होता है "सः न्यस्ति" अर्थात "जो अपना सर्वस्व समाज को न्यस्त कर दे" वही सन्यासी है । यानी कि जीवन अब उसका नहीं बल्कि समाज का हो जाता है ।

सन्यास के कुछ अन्य अर्थ भी प्रचलित है यथा त्याग कर देना , छोड़ देना, विरक्त हो जाना आदि ।

हम अक्सर सोचते हैं सन्यास का अर्थ है सभी कर्मों का त्याग कर देना सभी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेना और वल्कल वस्त्र धारण करके मात्र ईश्वर की उपासना में अपने जीवन को लगा देना अथवा कुछ और भी सन्यास शब्द का अर्थ ? आखिर सन्यास में क्या त्यागना जरूरी है ? क्या नहीं त्यागना चाहिए ? यह अत्यंत जटिल प्रश्न है । क्योंकि सन्यास और त्याग दोनों एक दूसरे के पर्याय जैसे हैं ।

 शिव जी कहते हैं कि अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से भी यही प्रश्न पूछा था कि "हे केशव! सन्यास और त्याग क्या है मैं अलग अलग जानना चाहता हूँ ।" इसका वर्णन गीता के अठारहवे अध्याय में किया गया है और यह अध्याय इसी विषय पर विवेचना करता है ।

इसका उत्तर देते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि : हे पार्थ! कुछ विद्वजन काम्य कर्मों के त्याग को सन्यास समझते हैं और कुछ विचारशील पुरुष सब कर्मों के फल के त्याग को सन्यास समझते हैं । हे अर्जुन ! किन्तु मेरा विचार है कि तीनों प्रकार के कर्मों ( सत, रज तथा तम) में से सत्कर्मो को करना तथा उनके फल का त्याग ही सन्यास है । अर्थात यज्ञ, दान तथा तप रूप कर्मों को एवं जो शास्त्रोक्त कर्म करना व्यक्ति का कर्तव्य है उसे आसक्ति तथा फल की इच्छा के बिना किया जाना ही त्याग अर्थात सन्यास है ।

यदि गीता के 18वें अध्याय के सभी 78 श्लोकों का अनुशीलन करके उन्हें सार रूप मे कहा जाए तो सन्यास हेतु जिन चीजो का त्याग आवश्यक है उन्हें सात श्रेणियों में बांट सकते हैं ।

1- निषिद्ध कर्मों का सर्वथा त्याग - चोरी, व्यभिचार, झूठ, कपट, छल, जबरदस्ती, हिंसा, अक्षम्य भोजन और प्रमाद आदि का त्याग ।

2- काम्य कर्मों का त्याग - स्त्री, पुत्र, धन आदि प्रिय वस्तुओं की प्राप्ति हेतु तथा रोग , संकट आदि की निवृत्ति हेतु निषिद्ध कर्मों का त्याग ।

3- तृष्णा का त्याग- अनैतिक तथा निषिद्ध इच्छाओं का त्याग ।

4- स्वार्थ हेतु दूसरों से सेवा कराने का त्याग - अपने सुख अथवा स्वार्थ सिद्धि हेतु किसी अन्य की बिना याचना सेवा लेना अथवा उसका प्रयोग करना या प्रयोग करने की इच्छाओं का त्याग ।

5 - सम्पूर्ण कर्तव्यों, कर्मों में आलस्य और फल की इच्छा का सर्वथा त्याग - इन्हें भी समझने हेतु कई वर्गों में बांटा जा सकता है -

5A - ईश्वर भक्ति में आलस्य का त्याग-
5B - ईश्वर की भक्ति में कामना का त्याग-
5C- देवताओं के पूजन में आलस्य व कामना का त्याग-
5D- माता पितादि गुरुजनों की सेवा में आलस्य और कामना का त्याग -
5E- यज्ञ, दान और तप आदि शुभ कार्यों में आलस्य और कामना का त्याग - यहां यज्ञ का अर्थ पांच महायज्ञ (देवयज्ञ, ऋषियज्ञ, पितृ यज्ञ, नृयज्ञ तथा भूतयज्ञ ) है ।
5F- शरीर सम्बन्धी कार्यों में आलस्य और कामना का त्याग-

6- संसार के सम्पूर्ण पदार्थों में और कर्मों में ममता और आसक्ति का सर्वथा त्याग -

7- संसार, शरीर और सम्पूर्ण कर्मों में सूक्ष्म वासना और अहंभाव का सर्वथा त्याग-

अर्थात यदि सार रूप से कहा जाए तो सन्यास का अर्थ घर-बार, पशु-परिवार छोड़ना नहीं बल्कि सन्यास में जिन चीजो क् त्याग करना आवश्यक है वे हैं दुष्प्रवृत्तियाँ, कामना, आलस्य आदि तथा अपने समस्त कर्मों को अकर्ता के भाव से फल की इच्छा से मुक्त होकर कर्तव्य करना ही वास्तव में सन्यास है ।