Monday, October 9, 2017

राक्षस

#शब्द_मीमांसा 18

शब्द -राक्षस

शब्द प्रेरणा -सोशल मीडिया

दिनाँक - 08/10/2017

पिछले कुछ दिनों से एक शब्द काफी प्रचलन में रहा है मुख्यतः विजयादशमी के उपरांत रावण का महिमामंडन करते हुए उसे रक्ष संस्कृति का जनक आदि बताना ।

राक्षस रजोगुण का द्वितीय विभाग है उसके छः विभागों में से । जैसा कि आप पूर्व में पढ़ चुके हैं गीता में श्रीभगवान ने कहा है जो कर्ता आसक्ति से युक्त कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने वाले के स्वभाव का है, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है वह राजस कहा गया है ।

चरक संहिता के पंचम अध्याय में राक्षस को राजस गुणी बताते हुए बताया गया है कि जो असहनशील, अकारण कुपित होने वाला, छिद्र अर्थात शत्रु के कमजोर स्थान पर वार करने वाला, क्रूर, भोजन में अत्यधिक रुचि लेने वाला, मांस का बहुत प्यारा, खूब सोने वाला और परिश्रम करने वाला , इर्ष्याशील हो उसे "राक्षस" समझें ।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है -
मानहिं मातु पिता नहिं देवा , साधुन ते करवावहि सेवा ।
जिन्ह के यह आचरन भवानी तेहि जानहु निशिचर खल कामी ।।

यह भी ध्यातव्य है कि दैत्य, असुर और राक्षस अलग अलग हैं उनके गुण तथा उत्पत्ति में भी अंतर है । अब बात करते हैं राक्षसों की उत्पत्ति और इनके वंशावली की ।

बाल्मीकि जी द्वारा रचित रामायण में भगवान राम की जिज्ञासा पर महर्षि अगस्त्य राक्षसों की उत्पत्ति की कथा का वर्णन करते हैं -

ब्रह्मा जी ने मानवों की रक्षा के लिए कुछ प्राणियों का निर्माण किया और कहा जाओ तुम मानवों की यत्नपूर्वक रक्षा करो । उनमें से कुछ क्षुधा पीड़ित प्राणियों ने कहा "रक्षाम:" अर्थात हम रक्षा करते हैं जिन्हें राक्षस नाम दिया गया कुछ ने कहा "यक्षाम:" अर्थात हम उत्तरोत्तर वृद्धि करते हैंउन्हेँ ब्रह्मा जी ने यक्ष नाम दिया ।

इन राक्षसों में दो भाई हेति तथा प्रहेति हुए दोनो मधु कैटभ की तरह शत्रुनाशकारी थे । प्रहेति धार्मिक होने के कारण तप करने चला गया । किन्तु हेति अपने विवाह का प्रयत्न करने लगा ।

हेति इस प्रकार विवाह की इच्छा लेकर स्वयं ही काल के सम्मुख पहुंच गया और उससे प्रार्थना की तथा काल की बहन "भया" जो कि महाडरावनी थी उससे विवाह कर लिया तथा "विद्युत्केश" नामक पुत्र की प्राप्ति हुई । विद्युत्केश का विवाह सन्ध्या की पुत्री "सालकटंकटा" से हुआ । उसने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम सुकेश था किंतु जन्म होते ही पुत्र को अकेला छोड़कर वह पुनः सम्भोग की इच्छा से अपने पति विद्युत्केश के पास पहुँच गयी । बालक अकेला पड़ा भूख आदि के कारण रोने लगा तो वहां से गुजरते हुए देवी पार्वती के कहने पर महादेव ने सुकेश को तुंरन्त उसकी माँ की उम्र का कर दिया तथा उसे आकाश मार्ग से गमन करने के लिए एक विमान भी दिया और माता पार्वती ने वरदान दिया कि राक्षसियों के गर्भ धारण करते ह् सन्तान जन्म लेगी तथा जन्म लेते ही वो अपनी माता की उम्र की हो जाएगी ।

सुकेश का विवाह ग्रामणी नामक गन्धर्व की कन्या देववती से हुआ जिससे तीन संताने क्रमशः माल्यवान, सुमाली तथा माली का जन्म हुआ । तीनों ने मेरु पर्वत पर जाकर घोर तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया तथा अजेय होने का वरदान प्राप्त किया । अजेय होने के उपरांत इन्होंने देवों, असुरों,मानवो तथा ऋषियों को सताना प्रारम्भ कर दिया । उनकी प्रार्थना पर विश्वकर्मा ने त्रिकूट पर्वत पर लंका नामक नगरी का निर्माण किया । इन तीनों का विवाह नर्मदा नामक एक गन्धरवी की तीन कन्याओं से हुआ ।

माल्यवान की पत्नी का नाम सुंदरी था जिससे बज्रमुष्टि, विरुपाक्ष, दुर्मुख, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, मत्त तथा उन्मत्त नामक सात पुत्रो और अनला नामक एक कन्या उत्पन्न हुई ।

सुमाली की पत्नी का नाम केतुमती था जिससे प्रहस्त, कम्पन, विकट, कालिकामुख, धूम्राक्ष, दण्ड, सुपार्श्व, संह्रादि, प्रघस और भासकर्ण नामक पुत्रो और कुंभीनशी, कैकसी, राका और पुष्पोत्कटा नामक पुत्रियों का जन्म हुआ ।

माली का विवाह वसुधा नामक गन्धरवी से हुआ जिसके अनल, अनिल, हर तथा सम्पाती नामक चार पुत्र हुए जो आगे चलकर विभीषण के मंत्री बने ।

इनके अत्यचारों से पीड़ित होकर सारे देवगण प्राणियों सहित भगवान शिव के पास गए इन्होंने कहा ये राक्षस मुझसे अवध्य है किंतु भगवान विष्णु इन्हें मार सकते हैं उनसे अनुनय कीजिये । एक घोर युद्ध में भगवान विष्णु ने समस्त राक्षसों को पाताल खदेड़ दिया और माली का वध किया । सुमाली को राजा बनाकर राक्षस गण सही अवसर की प्रतीक्षा करने लगे ।

भगवान विष्णु द्वारा रसातल खदेड़े जाने के कुछ समय के उपरांत सुमाली अपनी पुत्री कैकसी के साथ जो कि कमल त्यागे हुए लक्ष्मी की तरह सुंदर थी को लेकर पृथ्वी लोक पर भ्रमण करने निकला , भ्रमण करते हुए उसने देखा कि अत्यंत तेजस्वी कुबेर पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर अपने पिता पुलत्स्य पुत्र विश्रवा से मिलने आये थे । वह यह सब देखकर पुनः रसातल लौट गया और विचार करने लगा कि यदि मेरी पुत्री का विवाह विश्रवा से हो जाये और उससे पुत्रजन्म हो तो वे भी कुबेर की तरह ही तेजस्वी होंगे । यह विचार करके उसने अपनी पुत्री कैकसी को विश्रवा के पास जाने के लिए प्रेरित किया ।

कैकसी जब मुनि विश्रवा के पास पहुँची तो वे सन्ध्या (प्रदोष काल) के समय अग्निष्टोम कर रहे थे । कैकसी उनके सामने खड़ी हो गयी और अपने पैरों की तरफ देखते हुए पैर के अंगूठे से जमीन को कुरेदने लगी । जब विश्रवा ने उसके बारे में और उसके आने का प्रयोजन पूछा तो उसने कहा कि वो सुमाली की पुत्री कैकसी है तथा वो अपना हेतु स्वयं नहीं बताएगी उसे वे अपनी तपश्चर्या द्वारा स्वयं ज्ञात कर लें । विश्रवा ने ध्यान लगाकर उसका हेतुक जाना और बोले हे महाभागे ! मुझे ज्ञात हो गया है कि तुम पुत्र प्राप्ति हेतु मेरे पास आई हो किन्तु प्रदोष काल में आने के कारण तुम्हारे पुत्र बड़े क्रूरकर्मा होंगे, उन भयंकर राक्षसों की सूरत भी भयानक होगी और उनकी प्रीति भी क्रूरकर्मा बन्धु बांधवो से होगी । इसपर कैकसी बोली हे भगवन मुझे आपसे ऐसे दुराचारी पुत्र नहीं चाहिए मुझपर कृपा कीजिये ।  ऐसा सुनकर विश्रवा बोले हे शुभनने! अच्छा तेरा अंतिम पुत्र मेरे वंशानुरूप धर्मात्मा होगा ।

इस प्रकार कुछ काल बाद उस कन्या ने बड़ा भयंकर और वीभत्स राक्षस को जन्म दिया उसके दस सिर थे और बड़े बड़े दांत थे , उसके शरीर का रंग काला तथा आकर पहाड़ की तरह था । उसके होंठ लाल थे तथा बीस भुजाएं थी । उसका मुंह बड़ा तथा बाल चमकीले थे । उसके जन्म लेते ही अनेक अपशकुन हुए । उसके पितामह ने उसका नाम दशानन रखा ।

तदन्तर भीमकाय कुम्भकर्ण का जन्म हुआ उसके अंतर पर बुरी सूरत वाली सूर्पणखा का जन्म हुआ । उसके उपरांत धर्मात्मा विभीषण का जन्म हुआ जिनके जन्म पर अनेक शुभ संकेत हुए ।

तदन्तर कैकसी के द्वारा प्रेरित होने पर कुबेर की तरह ऐश्वर्य प्रप्त करने हेतु तीनो भाइयो ने गोकर्ण आश्रम में कठोर तप किया और ब्रह्मा जी से लम्बी आयु और अजेयता प्राप्त की । विश्रवा के कहने पर कुबेर ने रावण को लंका दे दी और स्वयं जाकर कैलाश पर्वत पर पुरी बसाकर रहने लगे । इस प्रकार लंका में राक्षसों  की पुनः स्थापना हुई ।

रावण का विवाह मय दानव और हेमा नाक की अप्सरा की पुत्री मंदोदरी से हुआ , कुम्भकर्ण का पाणिग्रहण वैरोचन की पौत्री तथा बलि की पुत्री बज्रज्वाला से हुआ और गन्धर्व राज शैलूष की पुत्री सरमा का विवाह विभीषण से हुआ ।

Thursday, September 28, 2017

अहंकार

#शब्द_मीमांसा #17

शब्द - अहंकार

शब्द संप्रेषक - मनीष जैन

दिनाँक - 28/09/2017

हमारी संस्कृति कहा गया है दान लेने वाला बड़ा होता है और देने वाला छोटा । दान पैर छूकर आदाता को दिया जाता है । हमारे प्राचीन ग्रन्थों कवि ने स्वयं को बार बार मन्दमति और अज्ञानी कहा है जबकि उसके शब्दों की गूढ़ता स्वयं को बड़ा विद्वान समझने वाले भी नहीं समझ पाते है । श्रीभगवान ने अकर्ता होकर कर्म करने की सलाह दी है । इन सब का एक मात्र कारण है कि व्यक्ति को स्वयं के कार्यों पर अहंकार न हो जाये और लोक कल्याण में बाधा उत्पन्न कर दे । तुलसीदास जी ने कहा है -

क्रोध पाप का मूल है । क्रोध मूल अभिमान ।।

अर्थात जब व्यक्ति में अभिमान आ जाता है तो उसे क्रोध आता है और क्रोध पाप का कारण बनता है अर्थात अहंकार व्यक्ति को पतित कर देता है । अहंकारी व्यक्ति की गति रावण जैसी होती है -

एक लख पूत सवालख नाती । ता रावण घर दिया न बाती ।।

सिर्फ रावण ही नहीं अपितु जब द्वारिका के लोगों को अहंकार हुआ अपनी अपराजेयता का तो उनकी बुद्धि भ्रष्ट हुई और उनका भी नाश हो गया जोकि स्वयं श्रीभगवान के बन्धु-बांधव और प्रजा थे ।

अहंकार शब्द की उत्पत्ति अहं शब्द से और अहं शब्द की उत्पत्ति "अह्" शब्द से हुई है जिसका अर्थ होता है "प्रशंसा " और अहं शब्द का अर्थ होता है मैं अथवा स्व अर्थात जब व्यक्ति स्वयं के आकार को ही विश्व मनाने लगता है यानी जो कुछ है वो स्वयं ही है तो का जाता है कि उसे अहंकार हो गया है ।

दर्शन के अनुसार चित्त का एक घटक योग है अहंकार । मन, बुद्धि तथा अहंकार से चित्त बनाता है । अहंकार द्वारा अहं का ज्ञान होता है । अहंकार तीन प्रकार का होता है सात्विक, रजस तथा तामस ।

सात्विक अहंकार से अधिष्ठाता देवता और मन की उत्पत्ति हुई है । रजस से दस इंद्रियों (पांच कर्मेन्द्रियों तथा पांच ज्ञानेन्द्रियाँ) की उत्पत्ति हुई है तथा तामस अहंकार से पांच सूक्ष्म महाभूतों की उत्पत्ति हुई है । अर्थात जब व्यक्ति को अपने अधिष्ठाता पर अभिमान हो तो वह सात्विक अहंकार कहलाता है तथा जब व्यक्ति को अपने इंद्रियों पर घमण्ड हो तो उसे रजस कहते हैं एवं यदि व्यक्ति अन्य भौतिक वस्तुओं का अहंकार हो जाये तो उसे तामस अहंकार की संज्ञा दी गई है ।

वेदांत दर्शन में अहंकार को एक अभिमानात्मक वृति माना गया है । यहां अहंकार शरीरादि विषयो के मिथ्या ज्ञान को कहा गया है । वैष्णव दर्शन के व्यूह सिद्धांत में अनिरुद्ध को अहंकार कहा गया है ।

संख्या दर्शन में दो मूल तत्व माने गए जो एक दूसरे से अलग होते हैं  जिनमें प्रथम है पुरुष अर्थात आत्मा और द्वितीय है प्रकृति । प्रकृति के तीन गुण होते है - सत्व, रज तथा तम । प्रलयकाल में ये तीनों सन्तुलित होते हैं किन्तु जब पुरुष की उपस्थिति में इनका सन्तुलन भंग होता है तो प्रकृति से बुध्दि (महान) का जन्म होता है जो सोचने वाला कार्य करती है जिसमें सत्व की मात्रा विशेष होती है । बुद्धि से अहंकार का जन्म होता है । अहंकार से मनस तथा पांच ज्ञानेन्द्रियो की उत्पत्ति होतीहै फिर जिनसे पांच कर्मेन्द्रियों और पांच तन्मात्राओं की उत्पत्ति होती है । अर्थात अहंकार से आसक्ति हमारी इंद्रियों में स्थित हो जाती है ।

Wednesday, September 27, 2017

दुःख

#शब्द_मीमांसा 16

शब्द - दुःख

शब्द संप्रेषक - राज चौकसे जी

पाशुपत शैव सम्प्रदाय में मुख्य पांच तत्व हैं -पति (कारण), पशु (कार्य), योगाभ्यास, विधि तथा दुःखान्त अर्थात दुःखों का अंत जिसे मोक्ष भी कहा जाता है ।

बौद्ध मत में भी भगवान बुद्ध कहते हैं संसार दुःख से भरा हुआ है , दुःखों की समाप्ति ही निर्वाण है। इसके लिए उन्होंने अष्टांगिक मार्ग की विरचना की जिसे उन्होंने दुःख निरोध गामिनी प्रतिपदा कहा है ।

वैशेषिक दर्शन के अनुसार सुख की इच्छा ही दुःखों का कारण है क्योंकि सुख और दुःख एक दूसरे से बंधे हुए हैं ।

दुःख शब्द की उत्पत्ति दुस्  से हुई है जिसका अर्थ होता है बुरा, दूषित, दुष्ट, नीच, कठिन , कठोर आदि । अर्थात वे भवनाएं जो आपके चित्त को दूषित करती हैं तथा आपको कष्ट, कठोरता अथवा बुराई का अनुभव कराती हैं वही दुःख हैं ।

आखिर इस दुःख का कारण क्या है ? इसका प्रत्येक दर्शन एक ही स्वर में उत्तर देता है वह है "इच्छाएं" हमारी इच्छाएं ही हमारे दुःखों का कारण हैं जिससे भय भी उत्पन्न होता है । हम लोगों से , वस्तुओं से यहां तक कि ईश्वर से भी अपेक्षा करते हैं कि वे हमारी इच्छा के अनुसार ही कार्य करें । किन्तु यह भूल जाते हैं उनमें भी प्रज्ञा है अथवा किसी अन्य प्रज्ञावान व्यक्ति की प्रज्ञा उनपर प्रभाव डालती है । इसलिए ये आवश्यक नहीं है कि वे हमारी इच्छा के अनुसार कार्य करें ।

दुःख कारण होता है भय का तथा भय से ही पाप तथा अनाचार का जन्म होता है । हम अपने दुःख का निर्माण स्वयं करते हैं सकाम कर्मों द्वारा । एक बड़े दार्शनिक में कहा है "जब तक मैं न चाहूं मुझे कोई दुःखी नहीं कर सकता है ।"

मृग स्वयं में कस्तूरी होने के बावजूद पूरे जंगल में दौड़ता है कस्तूरी पाने के लिए पर प्राप्त नहीं कर पाता है । इसी प्रकार प्रत्येक दुःख का निदान आप में स्वयं में होता है पर आप उसे बाहर ढूंढ रहे होते हैं और वो आपको प्राप्त नहीं होता आप और ज्यादा दुःखी होते हैं । वैशेषिक दर्शन में कहा गया है कि सुख की इच्छा का त्याग कर दिया जाए तो दुःख स्वयं ही दूर हो जाएगा ।

एक बार एक व्यक्ति राजा जनक के दरबार में आया और बोला ; महाराज मैं बहुत दुःखी कोई उपाय बताइये । राजा जनक बोले ये सिंहासन मुझे उठने नहीं दे रहा है यह मुझे पकड़े हुए है कैसे उठूँ और बिना खड़े हुए मैं आपको बता नहीं पाऊंगा तुम्हारे दुःखों का उपचार ।

व्यक्ति बोला - महाराज! सिंहासन आपको जकड़े हुए है या फिर आप सिंहासन को , यदि आप नहीं बताना चाहते तो मत बताइये पर मेरा मज़ाक मत उड़ाइये ।

राजा जनक बोले इसी तरह तुम दुःख को पकड़े हुए हो न कि दुःख तुम्हें । इच्छाओं का त्याग कर दो दुःख स्वयं चला जायेगा ।

गीता में श्रीभगवान ने भी कहा है -
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।।

Tuesday, September 26, 2017

प्रेम

#शब्द_मीमांसा 15

शब्द - प्रेम

शब्द संप्रेषक - मनीष जैन जी ।

तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा । जानत प्रिया एक मनु मोरा ।।
सो मनु रहत सदा तोहिं पाही । जानु प्रीति रस एतनेहु माही ।।

इसमें सीता माता हो हनुमान जी भगवान राम का उनके प्रति प्रेम का वर्णन करते हुए कहते है । "मैं तुमसे कितना प्रेम करता हूँ इस रहस्य को मात्र मेरा मन ही जानता है और वो मन भी सदैव तुम्हारे साथ ही रहता है ।"

सूरदास जी लिखते हैं -
"उद्धव मन न भये दस बीस , एक रह्यो सो गयो श्याम संग ।" 

यहां पर उद्धव जब गोपियों को ब्रह्मज्ञान देने की बात करते हैं तो वे कहती हैं , हे उद्धव! हमारे पास कोई दस या बीस मन तो हैं नहीं हमारा प्रेम भगवान कृष्ण के साथ इतना प्रगाढ़ है कि एक मन था वो भी उन्हीं के साथ चला गया अब आपका ब्रह्मज्ञान हम क्योंकर ले पाएंगे ?

प्रेम तो ऐसा भी होता है की एक बाघम्बर धारी अवधूत के लिए पार्वती समस्त वैभव छोड़कर भी तप करती हैं । सीता पति के साथ वन में अनेक कष्ट सहती है । राम इसी प्रेम के लिए पिता के दिये हुए वचन पूरा करने के लिए वन गमन करते हैं। महाराज शिवि का जीवों के प्रति इतना प्रेम हैं कि वे एक कबूतर को बचाने के लिए अपने शरीर का मांस काटकर तौल देते हैं । दधीचि को समाज और सृष्टि से इतना प्रेम कि अपनी अस्थियं तक दान कर दीं समाज के लिए । भगवान को भक्त से इतना प्रेम कि नङ्गे पैर दौड़ आते हैं और मुट्ठीभर चावल के बदले तिहूंपुर का राज दे देते हैं । सैनिक का प्रेम तो देखिए साहब वो अपनी मातृभूमि से इतना प्रेम करता है अपने प्रिय, परिजन और परिवार के प्रेम की बलि देकर खुद को निछावर कर देता है खुशी खुशी । भगीरथ का प्रेम देखिये उद्देश्य के लिए की कठिन तप करके गङ्गा को ही धरती पर ला दिया ।

यही नहीं प्रेम की महिमा का गान करते हुए बाइबिल भी अध्याय 23 योहन्ना 4 में लिखता है "प्रेम ही परमेश्वर है।" सूफी मत ईश्वर को ही इश्क कहता है । इश्क के तो प्रकार बताता है प्रथम इश्क हकीकी और इश्क मजीदी । इसी इश्क हक़ीक़ी की पराकाष्ठा में कबीर दास लिखते हैं -

"राम देव संग भाँवर लेहूँ धनि धनि भाग हमार ।"

बात करते हैं इस "प्रेम" शब्द के अर्थ की हम पाते है "प्रियं रमन्ति मनसा" अर्थात जब आपके मन में आपका प्रिय रमण करने लगे वही स्थिति प्रेम है ।

यदि हम ईप्सा के आधार पर देखें तो पाते हैं प्रेम के दो भेद हैं । जिसमें प्रथम है निष्काम प्रेम जिसमें कोई कामना कोई इच्छा नहीं होती व्यक्ति को अपने प्रिय से यहां तक प्रिय की इच्छा के बिना उसके सानिध्य की भी इच्छा नहीं । जब व्यक्ति का सर्वस्व उसका प्रिय ही होता है । इसे उच्चतम स्थान प्राप्त है ।

दूसरा प्रकार है प्रेम का सकाम प्रेम अर्थात प्रिय से कुछ इच्छाएं तथा अपेक्षाएं रखता है व्यक्ति उसकी परिस्थितियां और स्वयं के समर्पण को देखकर । किन्तु यह ध्यातव्य है कि सकाम प्रेम और स्वार्थ दोनों में अंतर होता है । सकाम प्रेम वास्तव में सहजीविता है प्रिय और प्रिया के मध्य दोनो एक दूसरे के लिए कुछ करते हैं और प्राप्ति की इच्छा भी रखते हैं देश और काल के अनुसार किन्तु स्वार्थ में एक पक्ष येन केन प्रकारेण अपनी इच्छाओं की पूर्ति के मन्तव्य रखता है । सकाम प्रेम को निम्न माना गया है तथा स्वार्थ को निकृष्टतम ।

अक्सर लोग सुंदर कांड का चौथाई दोहा दोहराते हैं - "भय बिनु होहिं न प्रीति" । क्या सच में प्रेम का एक मात्र कारण भय ही है  या और कुछ भी । वास्तव में प्रेम के दो कारण हैं ज्ञान तथा भय ।

प्रथम ज्ञान से निष्काम प्रेम का जन्म होता है जो कि पराकाष्ठा है प्रेम की । यह स्थाई होता है बिल्कुल ज्ञान की तरह जैसे ज्ञान कभी समाप्त नही होता सदैव बढ़ता जाता है वैसे ही ज्ञान आधारित प्रेम भी बढ़ता जाता है कभी समाप्त नहीं होता ।

द्वितीय कारण भय है प्रेम का; यह भय किसी भी वस्तु का हो सकता है , दण्ड का भय अथवा कुछ खो जाने या कुछ न प्राप्त कर पाने का  तथा यह उतना ही स्थाई होता है जितना कि भय, भय समाप्त होते ही यह प्रेम भी समाप्त हो जाता है ।

माता- पिता तथा गुरुजनों का प्रेम ममता तथा स्नेह कहलाता है जो हमें सदैव शिखर पर प्रतिस्थापित करने का प्रयास करता है ।

प्रेम यदि प्रेयसी या प्रिय से हो जाये तो उसे प्रीति कहते हैं।  इसमें महादेव से लेकर देवदास तक कि श्रेणियां हैं । यहां पर असफलता उग्रता, दीनता तथा हीनता का कारण बनती है । महादेव का सती के प्रति प्रेम ही था कि सती के आत्मदाह के उपरांत महादेव के तांडव से सृष्टि का नाश होना प्रारम्भ हो गया था । एक प्रेम का वर्णन कामायनी में जयशंकर प्रसाद ने किया है लिखते हैं -

एक पुरुष जो बज्र इंद्र का झेल सकता है,
सिंह की बाहों में भी खेल सकता है ।........
बिद्ध हो जाता बंकिम नयन के बाण से,
रूपसी है जीत लेती उसको मधुर मुस्कान से ।।

पुरु जैसे योध्दा का विजय रथ भी रुक जाता है इस प्रेम के आगे और उर्वशी के वियोग में वो दीनता को प्राप्त करते हैं । मेनकाएँ विश्वामित्रो की साधना भंग कर देती हैं ऐसा भी होता है ये प्रेम । दूसरी तरफ इसी प्रेम के कारण व्यक्ति को पार्वती मिलती है और वो शक्ति के साथ मिलकर शिव अर्थात कल्याण और सृजन की मूर्ति बन जाता है ।

जब ईश्वर से प्रेम होता है तो उसे भक्ति कहते हैं और ईश्वर को जब भक्त से प्रेम होता है तो वत्सलता कहलाता है और प्रेम विवश होकर नङ्गे पैर दौड़ पड़ते हैं भगवान ।

जब समकक्षों के साथ प्रेम हो जाये तो मित्रता कहलाती है । तथा यही प्रेम जब आपके अधीनस्थ आपसे करते हैं तो अनुशासन कहलाता है । इस प्रेम के बहुत रूप हैं और हर रूप में यह कल्याण ही करता है व्यक्ति का यदि इसके पथ से व्यक्ति विचलित न हो ।

Monday, September 4, 2017

गुण (तामस)

#शब्द_मीमांसा #14C

शब्द - गुण (तमस)

शब्द संप्रेषक - अभिजीत दत्त जी ।

तीन गुणों में अंतिम तथा निम्नतम गुण है तामस भगवान कृष्ण गीता के अठारहवें अध्याय के 22वें श्लोक में कहते हैं -

यस्तु कृत्स्नवेदकस्मिन्कार्ये सक्तमहेतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ।।

अर्थात जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है - वह तामस कहा गया है ।

आगे श्लोक 25 में श्रीभगवान कहते हैं , हे अर्जुन ! जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है वह तामस कर्म कहलाता है ।

जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित, घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला आलसी तथा दीर्घसूत्री है वह - तामस कहलाता है । भगवान वासुदेव श्लोक 28 में व्याख्या करते हुए कहते हैं ।

श्लोक 32 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ; हे पार्थ ! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को ही "यह धर्म है" ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य सम्पूर्ण पदार्थों को भिन्न मान लेता है, वह तामसी बुद्धि है ।

गोविंद श्लोक 35 में तामसी धारणाशक्ति के बारे में बताते हुए कहते हैं ; हे धनन्जय ! दुष्ट बुद्धि वाला मनुष्य जिस धारणशक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिंता और दुःख को तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता है - वह धारणाशक्ति तामसी है ।

हे भरतश्रेष्ठ ! जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है - वह निद्रा, प्रमाद, और आलस्य से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है ।

चरक संहिता में तामस गुण के तीन प्रकार बताये गए हैं जो कि क्रमशः हैं -

 प्रथम भेद तामस गुणों का है वह है पाशव अर्थात पशुवत इसके अंतर्गत जो व्यक्ति शरीर को अलंकृत करने की इच्छा न रखता हो , अपवित्र स्वभाव वाला, निंदित आचरण और भोजन वाला, मैथुनकामी, सोने के स्वभाव वाला पुरुष हो उसको "पाशव" प्रकृति का जानें ।

द्वितीय भेद तामस गुणों का है मात्स्य अर्थात जो डरपोक, अज्ञानी, भोजन का लोभी, अस्थिर चित्त, चंचल, काम और क्रोध में फंसा हुआ, भ्रमणशील, पानी की अधिक चाह रखने वाला हो उसे मात्स्य प्रकृति का जानें ।

तामस गुणों का तृतीय भेद बताया गया है वानस्पत्य अर्थात जो आलसी, केवल भोजन में ही दत्तचित्त, सब प्रकार से ज्ञान व बुद्धि से रहित जड़ पुरुष हो उसको वानस्पत्य प्रकृति का जानें ।

इस प्रकार यदि हम सार रूप से देखें तो सात्विक गुण वाला व्यक्ति वह है जो समाज और राष्ट्र को प्राथमिकता और स्व को द्वितीय स्थान पर रखता है ।

राजस गुणों वाला व्यक्ति वह है जो स्व को प्रथम स्थान पर रखता है येन केन प्रकारेण उसका स्व सिद्ध होना चाहिए ।

तमस गुणों वाला व्यक्ति वह है जो केवल समाज में रिष्टि करता है अर्थात उसका लाभ हो या न हो किन्तु समाज को नुकसान पँहुचें ।

Thursday, August 31, 2017

गुण (रजस)

#शब्द_मीमांसा #14B

शब्द - गुण (रजस)

शब्द संप्रेषक - अभिजीत दत्त जी ।

दिनाँक - 31/08/2017

तीन गुणों में से द्वितीय गुण है रजस गुण या रजो गुण जिसकी व्याख्या करते हुए गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहते हैं -

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोSशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ।।  (अध्याय 18 श्लोक 26)

अर्थात जो कर्ता आसक्ति से युक्त कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है - वह राजस कहा गया है

किन्तु उससे पूर्व ही श्लोक 23 में श्रीभगवान कहते हैं कि जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त होता है तथा भोगों को चाहने वाले पुरुष द्वारा या अहंकार युक्त पुरुष द्वारा किया जाता है वह कार्य राजस कहलाता है ।

श्लोक 31 में रजस बुद्धि के बारे में गोविंद व्याख्यायित करते हुए कहते हैं ; हे अर्जुन! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता वह बुद्धि राजस होती है ।

किन्तु है धनन्जय फल की इच्छा रखने वाला व्यक्ति जिस प्रकार धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्ति से धर्म, अर्थ तथा कामों को धारण करता है वह धारण शक्ति राजसी है । - ऐसा उदबोधन  श्रीभगवान द्वारा 34वें श्लोक में किया गया है अध्याय 18 के ।

राजस सुख के बारे में भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी श्लोक 38 में विवेचना करते हुए कहते हैं " जो सुख, विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है, वह भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विषतुल्य अर्थात बल, वीर्य, बुद्धि, धन, उत्साह तथा परलोक का नाश करने वाला होता है ।

रजस गुण जिन्हें चरक संहिता में रजस सत्व कहा गया है वहां पर इसके छः भेद बताये गए है जो कि क्रमशः हैं -

प्रथम भेद रजस गुण का है आसुर अर्थात जो शूरवीर, प्रचण्ड, दूसरों की निंदा करने वाला, ऐश्वर्यशाली, छल कपट करने वाला, रुद्र के तुल्य कोप से शत्रुओं को रुलाने वाला, भयंकर, दूसरों पर दया न करने वाला, अपनी ही बड़ाई चाहने वाला, आत्माभिमानी हो उसको आसुर जानें ।

द्वितीय भेद को राक्षस कहा गया है जो असहनशील, कारण से कुपित होने वाला, छिद्र अर्थात शत्रु के कमजोर स्थान पर वार करने वाला, क्रूर, भोजन में अधिक रुचि रखने वाला, मांस का बहुत प्यारा, खूब सोने और खूब परिश्रम करने वाला, ईर्ष्याशील हो उसे "राक्षस" चित्त वाला जानें ।

तृतीय भेद को पैशाच कहा गया है । जो बहुत खाने वाला, स्त्री के समान स्वभाव वाला, स्त्रियों के साथ एकांत में रहने की इच्छा रखने वाला, अपवित्र, शुद्धता व स्वच्छता से द्वेष रखने वाला, भीरू, दूसरों को डराने वाला, विकृत आहार और विकृत विहार वाला हो उसको पैशाच स्वभाव वाला जानें ।

रजस गुणों का चौथा भेद "सार्प" नाम से जाना जाता है अर्थात जो क्रोधित होने पर शूर और अक्रोध की स्थिति में भीरू, तीखे स्वभाव वाला, परिश्रम करने वाला, भययुक्त स्थानों में भी दिखने वाला और आहार विहार करने वाला हो उस व्यक्ति को सार्प जानें ।

पंचम भेद रजस गुणों का प्रैत नाम से अभिप्रेत है अर्थात जो सदा भोजन की इच्छा रखने वाला ,बहुत दुःखशील और आचार तथा उपचार से युक्त, निंदा करने वाला, दूसरों को अपने धन में भाग न देने वाला, बहुत लोभी, कर्म न करने वाला पुरूष हो उसको "प्रैत" या प्रेत स्वभाव वाला जाने ।

छठा और अंतिम भेद रजस गुणों का है "शाकुन" अर्थात जो कामों में निरंतर फंसा हुआ , निरन्तर आहार-विहार में लिप्त, चंचल, असहनशील, संचय न करने वाला पुरुष हो उसको शाकुन जानें ।

Wednesday, August 30, 2017

गुण (सात्विक)

#शब्द_मीमांसा #14A

शब्द - गुण (सात्विक)

शब्द संप्रेषक - अभिजीत दत्त जी ।

दिनाँक - 26/08/2017

तीनो गुणों में प्रथम और सर्वोच्च गुण है सत अथवा सात्विकता । श्रीमद्भागवतगीता में भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी कहते हैं -

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतं ।
अफल प्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्चते ।। (गीता 18/23)

 जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न  चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग द्वेष के किया गया हो - वह सात्विक कहा जाता है ।

आगे श्लोक 26 में श्रीभगवान कहते हैं जो कर्ता संगरहित , अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष शोकादि विकारों से रहित है - वह सात्विक कहा जाता है ।

 श्लोक 29 में अभिवर्णित किया गया है कि जो बुद्धि प्रवृत्ति मार्ग अर्थात गृहस्थ में रहते हुए फल और आसक्ति का त्यागकर भगवदर्पण बुद्धि से केवल लोकशिक्षा के लिए है तथा निवृत्ति मार्ग अर्थात देह का अभिमान त्यागने वाला, कर्तव्य और अकर्तव्य, भय तथा अभय को एवं बन्धन और मोक्ष को यथार्थ जानती है वह बुद्धि सात्विकी है ।

चरक संहिता के द्वितीयखण्ड के पंचम अध्याय जिसे शारीरस्थानम् नाम से शीर्षित किया गया है में इस सात्विक चित्त के सात भेद बताये गए हैं जो कि क्रमशः -

सात्विक चित्त का प्रथम भेद है ब्राह्म । इसके गुणों के वर्णन इस प्रकार है - जो पवित्र, सत्यप्रतिज्ञ, जितात्मा, सम्पत्ति और सत्फ़ल को अन्यों के साथ बांटकर भोगने वाला, ज्ञान-विज्ञान, वचन-प्रतिवचन की शक्ति से युक्त, स्मृतिमान काम, क्रोध, लोभ, अभिमान, मोह, ईर्ष्या, हर्ष और क्रोध से रहित, सब प्राणियों में समबुद्धि रखने वाला हो उसे ब्राह्म प्रकृति का जानें ।

द्वितीय सात्विक चित्त है आर्ष । जिसका वर्णन है - जो यज्ञ करने वाला, अध्ययनशील, व्रत का पालक, होमशील, ब्रह्मचर्य का पालक, अतिथिपूजक, मद, मान, राग, द्वेष, मोह, लोभ और रोष से रहित, प्रतिभा से युक्त वचन, विज्ञान, उपधारणा इन शक्तियों से सम्पन्न पुरुष हो उसको आर्षचित्त वाला जानें ।

तृतीय सात्विक चित्त का प्रकार है ऐन्द्र । जो ऐश्वर्यवान, ग्रहण करने योग्य वाक्य वाला, यज्ञ करने वाला, शूर, ओजस्वी, तेज़ से युक्त, साहसिक, क्रूर कर्मों को न करने वाला, दूरदर्शी, धर्म, अर्थ और काल दत्तचित्त पुरुष को "ऐन्द्र" समझें ।

चतुर्थ सात्विक चित्त का भेद है याम्य । जो कर्तव्य और अकर्तव्य की मर्यादा में रहने वाला, प्राप्तकारी अर्थात अवसर के अनुसार कार्य करने वाला, असंप्रहार्य अर्थात जिसपर कोई प्रहार न कर सके और न ही जिसकी मार रोकी जा सके, उन्नतिशील, स्मृतिवान, ऐश्वर्यशील, राग, द्वेष, मोह से रहित पुरुष हो उसको याम्य जाने ।

पंचम भेद वारुण का वर्णन है - जो शूरवीर, धीर, पवित्र और मैलेपन से द्वेष करने वाला, यज्ञ करने वाला, जलक्रीड़ा में रत, क्लिष्ट कर्मों से भिन्न सुख से होने वाले कर्मों को करने वाला, उचित स्थान पर कोप तथा कृपा करने वाला पुरुष हो उसको वारुण जानें ।

षष्ठ भेद है सात्विक चित्त का "कौबेर" । जो स्थान, मान, उपभोग, सामग्री, परिवार से युक्त, नित्य शर्म, अर्थ और काम में तत्पर, पवित्र, सुखपूर्वक विहार विनोद करने वाला, उचित स्थान पर कोप व प्रसन्नता प्रकट करने वाला पुरुष हो उसको कौबेर प्रकृति का जानें ।

सप्तम तथा अंतिम भेद है सात्विक चित्त का जिसे गांधर्व से संज्ञापित करते हैं । जो नृत्य, गीत, बाजे, स्त्रोत, श्लोक, आख्यायिका, इतिहास, पुराणों को पसन्द करने वाला, इनमें कुशल, सुगन्ध, माला,  अनुलोम, वस्त्र, स्त्रियों के साथ विहार करने वाला, अनिंद्य पुरुष हो उसको "गांधर्व" जाने ।

गुण

#शब्द_मीमांसा #14

शब्द- गुण

शब्द प्रेरणा - चरक संहिता

दिनाँक - 24/08/2017

वैशेषिक दर्शन के अनुसार पदार्थ छः हैं - द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समन्वय । इसके अतिरिक्त कुछ स्थानों पर "अभाव" को भी पदार्थ माना गया है इसप्रकार कुल मिलाकर सात पदार्थ होते हैं और उनमें से "गुण" भी एक पदार्थ है ।

गुण शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के "गु" शब्द से हुई है जिसका अर्थ होता है बुराइयों का त्याग करना अर्थात जिसमें बुराइयां न हो वही गुण है । इसके अतिरिक्त गुण का अन्य अर्थ हैं धनुष की प्रत्यंचा, तंतु, दोहराना, दुर्बा घास आदि । किन्तु हम विवेचना करेंगे सात पदार्थों में से एक पदार्थ गुण की ।

भाषापरिच्छेद के अनुसार "द्रव्यश्रयी अर्थात द्रव्य में रहने वाला, कर्म से भिन्न और सत्तावन पदार्थ ही गुण है ।" इसके चौबीस प्रकार बताये गए हैं जो कि क्रमशः है - रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिणाम, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, यत्न, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, संस्कार, धर्म,  अधर्म तथा शब्द ।

शाक्त मतानुसार प्राथमिक सृष्टि की प्रथम अवस्था में शक्ति का जागरण दो रूपों क्रिया तथा भूति में होता है तथा इसके छः आश्रित गुणों का प्रकटीकरण होता है जो कि क्रमशः ज्ञान , शक्ति, प्रतिभा, बल, पौरुष एवं तेज हैं । वैष्णव सम्प्रदाय के अनुसार इन्हीं छः आश्रित गुणों द्वारा वासुदेव के पंचरात्रो में प्रथम और उनकी शक्ति लक्ष्मी का प्रादुर्भाव होता है । इसके अतिरिक्त अन्य छः गुणों के पृथक पृथक युग्म द्वारा अन्य पंचरात्रो संकर्षण, प्रद्युम्न और अनुरुद्ध तथा उनकी शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है ।

संख्या दर्शन के अनुसार गुण प्रकृति के घटक हैं तथा इनकी संख्या 3 है सत, रज तथा तम । श्रीमद्भागवत गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने इन्हीं तीन गुणों का व्याख्यान दिया है ।

चरक संहिता के शरीरस्थानम नामक अध्याय में भी इन्हीं तीन प्रकार के गुणों का वर्णन है जिसे वहां पर सत्व अर्थात मन कहा गया है तथा प्रत्येक को कई उपविभागों में वर्णित किया गया है -

सर्वप्रथम सत गुण के सात भेद बताये गए हैं जो कि क्रमशः है - ब्रह्म, आर्ष, ऐन्द्र, याम्य, वारुण, कौवेर तथा गन्धर्व ।

द्वितीय रजस गुणों को छः भेदों में बांटा गया है जिसके नाम क्रमशः आसुर, राक्षस, पैशाच, सार्प, प्रैत तथा शाकुन हैं ।

तृतीय तामस गुण के तीन भेद बताये गए हैं जोकि क्रमशः हैं - पाशव, मात्स्य तथा वानस्पत्य ।

संख्या दर्शन के अनुसार सत्व का अर्थ है प्रकाश अथवा ज्ञान, रज का अर्थ है क्रिया या गति एवं तम का अर्थ है अंधकार अथवा जड़ता । आगे कहा गया है कि जिस प्रकार तीन धागों से रस्सी बंटी जाती है उसी प्रकार सारी सृष्टि तीन गुणों से घटित है ।

मीमांसा

#शब्द_मीमांसा #13

शब्द - मीमांसा

शब्द संप्रेषक - नितिन गुप्ता जी

दिनाँक - 23/08/2017

प्राचीन भारतीय वैदिक दर्शन को छः भागों में बांटा गया है जिसे षड्दर्शन कहा जाता है जो कि हैं क्रमशः - संख्या दर्शन, योग दर्शन,  न्याय दर्शन, वैशेषिक दर्शन, वेदांत दर्शन तथा मीमांसा ।

मीमांसा शब्द का पाणिनि के अनुसार शाब्दिक अर्थ है "जानने की इच्छा या लालसा ।"
चतुर्वेद कोष के अनुसार मीमांसा का अर्थ है गूढ़ विचार या अनुसंधान अथवा खोज है । मीमांसा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के "मीम्" शब्द से हुई है जिसका अर्थ होता है "शब्द की विवेचना करना" ।

मीमांसा का तात्विक दर्शन विपक्षण है । इसकी गणना अनीश्वरवादी दर्शनों में की जाती है । आत्मा, ब्रह्म, जगत आदि की विवेचना इसमें ही आती यह केवल वेद तथा उसके शब्दों की नित्यता का ही प्रतिपादन करता है ।

मीमांसा दर्शन को दो भागों में बांटा गया है प्रथम है पूर्वमीमांसा इसके लेखक जैमिनी है । पूर्वमीमांसा में कुल 907 अधिकरण तथा 2645 सूत्र हैं । प्रत्येक अधिरण पांच भागों में बंटा हुआ है जो है क्रमशः - विषय, संशय, पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष तथा सिद्धांत । मीमांसा का द्वितीय भाग है उत्तरमीमांसा इसके ग्रन्थ ब्रह्मसूत्र के रचयिता हैं वादरायण ।

किसी शब्द अथवा पद की मीमांसा किये जाने के लिए कुछ सिद्धांतो का पालन किया जाना आवश्यक होता है -

प्रथम सिद्धांत है शाब्दिक मीमांसा का सिद्धांत अर्थात किसी भी वाक्य या शब्द के व्याकरणीय शाब्दिक अर्थ पर सर्वप्रथम  ध्यान दिया जाना चाहिए ।

द्वितीय सिद्धांत हैं शब्द के विषय तथा आशय को देखा जाना अर्थात शब्द जहाँ प्रयोग किया जा रहा है उसका विषय तथा आशय क्या है उसी अनुसार शब्द का अर्थ लगाया जाना चाहिए ।

तृतीय सिद्धांत है रिष्टि परिहार का सिद्धांत अर्थात यदि प्रारम्भ के दोनों सिद्धांतो से सही अर्थ नहीं निकल रहे हो तो उक्त शब्द का वही अर्थ निर्दिष्ट किया जाना चाहिए जो कि लोकहित में हो ।

चतुर्थ सिद्धांत है सहचर्येण ज्ञायते का अर्थात विशेष शब्दों के साथ आने वाले सामने शब्दों का भी उसी क्रम में अर्थ होता है जो कि विशेष शब्दों से आशय निकलता हो ।

पूर्वमीमांसा में तात्पर्य निर्णय के लिए सात बातों को आवश्यक बताया गया है जो कि क्रमशः है -

उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास अपूर्वता अर्थात नवीनता, फल यानी उद्देश्य, अर्थवाद अर्थात महात्म्य और अंतिम है  उपपत्ति जिसका अर्थ होता है प्रमाणों द्वारा सिद्धी ।

अर्तिका

#शब्द_मीमांसा #12

शब्द - अर्तिका

शब्द संप्रेषक - सारिका सौरभ

 शब्द अर्तिका वास्तव में संस्कृत भाषा का शब्द है इसका अर्थ होता है "बड़ी बहन" ।  इसे इसी तरह से हूबहू हिंदी भाषा ने अपना लिया बिना किसी अपभ्रंश के ।

 स्त्री को प्रत्येक रूप में पूजनीय माना गया है चाहे वो माता हो, बहन हो, पुत्री या पत्नी हो । मनु ने कहा है "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" अर्थात जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवता रमण करते हैं ।

बात करते हैं बहनों की जैसा कि परम्परा रही है साल में दो बार हम बहनों से आशीर्वाद लेते हैं एक बार तो दीपावली के बाद भैया दूज में और दूसरी बार रक्षाबंधन पर । हमारे बीच एक गलत धारणा प्रचलित है कि रक्षा बंधन पर बहन भाई की कलाई पर राखी इसलिए बंधती है कि वो उसकी रक्षा करे । जी नहीं ये सत्य नहीं है वो इसलिए बांधती है ताकि उसका भाई पूरे वर्ष रोगों तथा व्याधियों से मुक्त रहे और उसे हमेशा सद्बुद्धि और सद्विचार प्राप्त हों ।

यजुर्वेद में कहा गया है "जिसे रक्षा बंधन बांधा जाता है वह पूरे वर्ष निरोग, संकटो को जीतने वाला और उत्तम विचारों वाला बना रहता है ।"  अर्थात वो बन्धन अपनी स्वयं की रक्षा के हेतु न होकर जिसे बांधते है उसकी रक्षा के लिए होता है । ताकि वह व्यक्ति अपने कर्तव्यों को पूरा कर सके जो कि उसके परिवार, समाज तथा राष्ट्र के प्रति होते है ।