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Tuesday, March 6, 2018


शब्द मीमांसा २५

शब्द – ॐ

दिनांक – ०२/०३/२०१८

आज फिर समय मिल गया शिव से मुखातिब होने का | उसे समय क्या कहें यूँ समझिये जरूरत थी मुझ जैसे स्वार्थी लोग जो बिना जरूरत के श्वास भी नहीं लेते हैं | गया तो शिव बोले कहो बालक कैसे आना हुआ ? मैंने कहा बस आपके दर्शनों की अभिलाषा और कुछ प्रश्न खिंच लाते है भगवान आपके पास |

शिव बोले – दर्शन तो हो गया अब तो जल्दी से सवाल भी बोल दो जल्दी से | मैंने कहा – हे महादेव ! यह ॐ क्या है ? आखिर इसका अर्थ और संरचना की है ?

भगवान शिव हंसते हुए बोले – बड़ा खतरनाक सवाल पूछा तूने एक बार इसी सवाल के कारण ब्रह्मा जी बंदी बना लिए गये थे |

मुझे आश्चर्य हुआ आखिर ब्रह्मा जी क्यों बंदी बना लिए गये थे इस सवाल के लिए ? मैंने पूछा – क्या हुआ था भगवान पूरा पूरा बताइए |

शिव बोले – एक बार कार्तिकेय ने यही प्रश्न ब्रह्मा जी से किया था की हे ब्रह्मदेव आपको तो सभी चीजों का ज्ञान रहता है इसलिए आप मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिये कि ॐ क्या है ? इसपर ब्रह्मा जी जब बताने से असमर्थता जताई तो उन्होंने कहा की अब तो आपको मेरा बंदी बनना पड़ेगा और विडम्बना देखिये कर्ता( ब्रह्मा जी ) कृति (कुमार कार्तिकेय) के बंदी बनकर साथ चल पड़े | ब्रह्मा जी के सृजन का कार्य बाधित होने के कारण समस्त सृष्टि में असंतुलन की स्थिति आ गयी सभी देव मेरे पा आये और सारा हाल बताया तो मैंने कार्तिकेय से पूछा आपने ब्रह्मा जी को बंदी क्यों बनाया ? इसपर कुमार कार्तिकेय ने कहा – पिता जी मैंने कहा बनाया उन्हें बंदी वो तो स्वयं बंदी बने हैं अपने अज्ञान के अन्धकार के | आप स्वयं सोचिये जिन्हें ॐ का ज्ञान नहीं है वो सृष्टि का निर्माण कैसे करता होगा ? मैंने कार्तिकेय से पूछा की तो फिर उन्हें मुक्त करने के लिए क्या करना होगा ? कुमार बोले पिता जी आप ही मुझे ॐ का अर्थ बताइए और इन्हें मुक्त करा लीजिये | मैंने कहा मुझे तो नही पता है तुमको पता हो तो बताओ | इसपर कुमार बोले इसके लिए आपको मुझे अपना गुरु मना पड़ेगा | इस तरह कार्तिकेय ने मेरी गोद में बैठकर अपने पिता तथा शिष्य यानी मुझे ॐ शब्द का उपदेश दिया |

शिव की बातें सुनकर मैंने शिव से कहा वाह बहुत रुचिकर कथा है भगवन आगे क्या बताया कुमार ने ये बताने का कष्ट करें प्रभु | मेरी बात पर भगवान शिव ने कहा – पागल लडके बताने के लिए ही तो ये कथा प्रारम्भ की है मैंने इतना अधीर्ण क्यों होता है तू |

आगे नीलकंठ ने कहना शुरू किया – सुन !  ॐ एक अक्षर, एक शब्द तथा नाद तीनों एक साथ है यह तीन ध्वनियों का मेल है ‘अ’, ‘उ’ तथा ‘म’ | दुनिया का कोई भी भाषा बोलने वाले व्यक्ति का जब मुंह खुलता है तो ‘अकार’ के साथ तथा बंद होता है ‘मकार’ के साथ तथा ‘उकार’ की दशा आधा खुला तथा आधा बंद रहता है अतैव विश्व की समस्त ध्वनियाँ तथा स्वर इसी ॐ में समाहित है ॐ एक विशिष्ट वैश्विक ध्वनि है तथा इश्वर का प्रतीक भी |

मंडूकोपनिषद के अनुसार समस्त जाग्रत अवस्था का प्रपंच ‘अ’ से प्रारम्भ होता है तथा सुसुप्तावस्था के प्रपंच ‘म’ से शुरू होते हैं एवं स्वप्नावस्था के प्रपंच ‘उ’ से प्रारम्भ होते हैं |जिससे तीनों अवस्थाओं के प्रपंच आत्म तथा ब्रह्म से प्रारम्भ होकर पुनः उसी में विलीन हो जाते हैं वैसे ही ॐ शांति से उत्पन्न्होकर उसी में विलीन हो जाता है अतैव ॐ शब्द भी है और निःशब्द भी |

जब हम ओंकार की ध्वनि करते हैं तो दो ओंकार के मध्य जो अन्तराल की निःशब्दता होती है उसे अमात्रा कहा जाता है वह निर्गुण ब्रह्म का प्रतीक है | जैसे ‘अ’, ‘उ’ में तथा ‘उ’, ‘म’ में विलीन हो जाता है तथा ‘म’ अंत में निःशब्दता में विलीन हो जाता है ठीक उसी तरह उपासना में जब हम ॐ का उच्चारण करते हैं तो उस नाद द्वारा स्थूल, सूक्ष्म में विलीन होने लगता है और सूक्ष्म कारण में विलीन होने लगता है तदन्तर कारण इन सभी भौतिक बाधाओं को का अतिक्रमण करके आत्मा तथा आत्मा, ब्रह्म में विलीन होने लगती है | इस तरह ॐ प्रणव है जिससे इश्वर का प्रणयन किया जाता है |

कुछ समझ भी आया या बैठे बैठे सुन ही रहा है ? – शिव के ये वचन सुन मेरी तंद्रा भंग हुई | मैंने कहा हे शिव इतना विशद ? एक प्रश्न और था की ये मन्त्रों के प्रारम्भ और अंत में ॐ का उच्चारण क्यों किया जाता है ?

शिव बोले – तेरे प्रश्न समाप्त नहीं होने वाले न ? तो सुन जब ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण प्रारम्भ किया था तो दो शब्दों के साथ किया था “ॐ” तथा “अथ” अतः प्रत्येक कार्य का प्रारम्भ ॐ शब्द के साथ किया जाना शुभ होता है |

मंडूकोपनिषद का कथन है – “ओंकार धनुष है तथा जीवात्मा बाण है एवं लक्ष्य ब्रह्म है | बाण को धनुष द्वारा इतने लक्ष्य के साथ छोड़ा जाना चाहिए की वह लक्ष्य के साथ बिद्ध होकर उसी के एकाकार हो जाये |

मैंने शिव को धन्यवाद ज्ञापित किया तथा उनका अभिवादन कर पुनः अगले विशेष प्रश्न तक के लिए विदाई लेकर लौट आया |

पुरुष


शब्द मीमांसा २४

शब्द – पुरुष

दिनांक – २८/०२/२०१८

पुरुष शब्द अत्यंत व्यापक शब्द है | भाषा में इसे लिंग विशेष के लिए प्रयोग किया जाता है जिसका तात्त्पर्य स्त्री केविपरीत लिंग से होता है | हिंदी भाषा में पुरुष शब्द का अगर शाब्दिक अर्थ देखा जाये तो होता है “जो पुर अर्थात समाज की सेवा करता है वही पुरुष है” | एक अन्य अर्थ के अनुसार जो पुरुषार्थ को प्राप्त करने की क्षमता रखता है वह पुरुष है | ये सभी इस बात को इंगित करते हैं की मात्र XY गुणसूत्र के साथ पैदा हो जाने से ही व्यक्ति पुरुष नहीं होता है बल्कि जो समाज को सेवित करता है तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करने की क्षमता रखता है वही पुरुष है |

प्राचीन भारतीय दर्शन में पुरुष शब्द का अन्य अर्थ ही लिया जात है ऋग्वेद में कहा गया है “पुरि शेते इति” अर्थात जो पुर यानी शरीर में शयन करता है वही पुरुष है | ऋग्वेद के दशम मंडल के पुरुषसूक्त में भारतीय समाजवाद का एक अप्रतिम चित्रण किया गया है वहां पर चारों वर्णों को एक ही शरीर का हिस्सा बताया गया है वह शरीर परम पुरुष का अर्थात समाज का है | यहाँ पर यह ध्यान देने की बात है की वहां पर किसी वर्ण की उत्पत्ति नहीं बताई गयी है बल्कि उसके कार्य बताये गये हैं | वहां कहा गया है की “ब्रह्मणो मुखासीत” जिसका अर्थ होता है “ब्राह्मण मुख है न की मुख से उत्पन्न है” “बाहु राजन्या कृतः” अर्थात क्षत्रिय का कार्य वही है जो शरीर में बाहों का है समस्त की रक्षा करना इसी प्रकार से वैश्य द्वारा अमाज का पोषण तथा शूद्र द्वारा सबसे महत्वपूर्ण कार्य सम्पादित होता है शरीर को चलायमान करना नही तो समाज ठहर जायेगा और विकृतियाँ उत्पन्न हो जाएँगी | पर यह स्थिति खेदजनक है की इस सूक्त का गल्र अर्थ निकालकर मात्र समाज को तोड़ने का कार्य हो रहा है दुनिया के किसी भी शरीर क्रिया विज्ञान की पुस्तक में मुख को पैर से श्रेष्ठ नहीं बताया गया है फिर वर्ण व्यवस्था में कोई श्रेष्ठ कैसे हो सकता है ? आगे इसी सूक्त में इस परम पुरुष के पैरों को पृथ्वी कहा गया है अर्थात शूद्र को पृथ्वी की तरह समस्त वर्णों को धारण करने वाला तथा उनकी उत्पत्ति एवं पोषण का हेतु माना गया है |

सांख्य दर्शन के अनुसार समस्त सृष्टि का निर्माण दो तत्वों प्रकृति तथा पुरुष से हुई है जिसमें प्रकृति जड़ तत्व तथा पुरुष चेतन तत्व जिसमें से प्रकृति के द्वारा प्राणियों के स्थूल शरीर का तथा पुरुष के द्वारा मनुष्य के सूक्ष्म शरीर का निर्माण होता है दोनों मिलकर कारण शरीर बनाते इसी से समस्त कार्य सम्पन्न होते हैं | व्यक्ति का अंतिम लक्ष्य है प्रकृति तथा पुरुष को अलग अलग करके पुरुष तत्व को परमपुरुष में समाहित कर देना |

गीता के अनुसार पुरुष तीन प्रकार के होते हैं – क्षर, अक्षर तथा पुरुषोत्तम |
जिसमें क्षर पुरुष के अंतर्गत समस्त नश्वर संसार की समाविष्टि है, अक्षर के अधीन जो अनश्वर है अर्थात जीवात्मा का समावेश है जबकि पुरुषोत्तम के अंतर्गत वह तत्व आता है जो क्षर और अक्षर दोनों से परे है जिससे दोनों की उत्पत्ति हुई है अर्थात जो परमात्म तत्व है |
संस्कृत व्याकरण में तीन प्रकार के पुरुष का प्रयोग होता है प्रथम पुरुष, मध्यम पुरुष तथा उत्तम पुरुष | जहाँ और प्रथम पुरुष उसके लिए जो सम्वाद में उपस्थित नहीं है, मध्यम पुरुष उसके लिए जिससे सम्वाद किया जा रहा है तथा उत्तम पुरुष उसके लिए जो सम्वाद बोल रहा है |

पुरुष के गुण को पौरुष कहा गया है किंतु पौरुष का तात्पर्य कहीं भी बल प्रदर्शन मात्र नहीं है आताताई बन जाना पौरुष नहीं है, किसी अन्य पर चाहे वे बाल, वृद्ध हों अथवा नारी हों उनपर अनावश्यक बल का प्रदर्शन पौरुष नहीं है | हमारे लोकनायक रहे और ईश्वर के रूप में पूजनीय भगवान राम ने इन विषयों पर सुंदर प्रतिमान स्थापित किये हैं | उन्होंने सदैव पीड़ितों की सेवा और दुष्टों को दंड दिया जाना ही पौरुष बताया है | मैं जहाँ पैदा हुआ हूँ कहा जाता है मैं क्षत्रिय हूँ, मुझे बार बार उलाहना भी मिलती है की मांसाहार नही करते कैसे क्षत्रिय हो, टैक्सी वाले को पूरा किराया दे दिया कैसे क्षत्रिय हो ? शांति की बात करते हो कैसे क्षत्रिय हो ? जैसी अनेक बातें होती है पर वास्तविकता तो यह है किसी भी पुरुष का क्षत्रिय का ये कार्य नहीं की वो बेवजह किसी को कष्ट दे , लोगों के अधिकारों का अपहरण करे | उसका काम रक्षा तथा सेवा करना समाज की राष्ट्र की और मानवता की |